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गुजरात की राजनीति:पहली बार विधायक बने भूपेंद्र पटेल गुजरात के पांचवें पाटीदार CM बने, नाराज पाटीदारों को मनाने मोदी-शाह ने चला है दांव

अहमदाबाद9 दिन पहले
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घाटलोडिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक भूपेंद्र पटेल राज्य के नए मुख्यमंत्री बने भूपेंद्र पटेल, विजय रूपाणी के साथ। - Dainik Bhaskar
घाटलोडिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक भूपेंद्र पटेल राज्य के नए मुख्यमंत्री बने भूपेंद्र पटेल, विजय रूपाणी के साथ।

भारतीय जनता पार्टी ने 24 घंटे से कम समय में गुजरात के नए मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान कर दिया है. गुजरात के अहमदाबाद के घाटलोडिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक भूपेंद्र पटेल राज्य के नए मुख्यमंत्री होंगे। बता दें, भूपेंद्र पटेल 2017 में पहली बार ही विधायक बने हैं और चार साल में ही बीजेपी आलाकमान ने उन्हें सीएम पद से नवाजा है।

पाटीदारों का गुस्सा कम करने मोदी-शाह ने चला है दांव
पाटीदार समाज गुजरात की राजनीति में बदलाव लाने वाला फैक्टर है। राज्य के 15 प्रतिशत मतदाता यानी की विधानसभा की 71 सीटों पर प्रभुत्व रखने वाले पाटीदार पिछले काफी समय से भाजपा से नाराज हैं। भाजपा ने असंतुष्ट पाटीदारों को खुश करने के लिए यह पाटीदार कार्ड खेलते हुए भूपेंद्र पटेल को गुजरात का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया। यानी 5 साल बाद गुजरात में फिर से पाटीदार सत्ता आ गई है। भूपेंद्र पटेल पाटीदार समाज के नेता हैं, साथ ही कडवा और लेउवा दोनों पटेल समुदायों में उनकी अच्छी छवि है।

गुजरात के दो बार मुख्यमंत्री रहे स्व. केशुभाई पटेल की फाइल फोटो।
गुजरात के दो बार मुख्यमंत्री रहे स्व. केशुभाई पटेल की फाइल फोटो।

एक भी पाटीदार सीएम 5 साल पूरे नहीं कर सका
गुजरात में मतदाताओं के दबदबे के बीच इससे पहले 4 पाटीदार मुख्यमंत्री बने, जिसमें चिमनभाई पटेल और केशुभाई पटेल दो बार मुख्यमंत्री बनने के बावजूद पांच साल तक सत्ता में नहीं रह सके। इतिहास पर नजर डालें तो बाबूभाई पटेल से लेकर केशुभाई पटेल तक कोई भी पाटीदार मुख्यमंत्री किसी भी कारण से अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। वर्ष 1976 में बाबूभाई आपातकाल के चलते और इसके बाद चिमनभाई नवनिर्माण आंदोलन के चलते पांच साल पूरे नहीं कर सके थे। वहीं, अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान चिमनभाई का अवसान हो गया था।

इसके बाद केशुभाई पटेल की कुर्सी भाजपा में बगावत के चलते और दूसरी बार पार्टी द्वारा इस्तीफा लेकर गुजरात की जिम्मेदारी नरेंद्र मोदी को दे दी गई थी। इससे केशुभाई दोनों टर्म के दौरान अपने पांच साल पूरे नहीं कर सके थे। वहीं, इसके बाद आनंदीबेन पटेल भी अपने पांच साल पूरे नहीं कर सकी थीं। हालांकि, उन्होंने उम्र का बहाना बनाकर इस्तीफा दिया था, लेकिन सच बात तो यही थी कि उनकी कु्र्सी पाटीदार आरक्षण आंदोलन और स्थानीय निकाय चुनावों के बुरे नतीजों के चलते ही गई थी।

2012 में गुजरात के कुल 182 विधायकों में से 50 पाटीदारों को टिकट दिया गया था, जिनमें से 36 ने जीत दर्ज की थी।
2012 में गुजरात के कुल 182 विधायकों में से 50 पाटीदारों को टिकट दिया गया था, जिनमें से 36 ने जीत दर्ज की थी।

पाटीदारों के गुस्से के चलते बीजेपी को सिर्फ 99 सीटें मिली थीं
नरेंद्र मोदी के गुजरात से जाने के बाद भाजपा से पाटीदारों का गुस्सा बढ़ता चला गया और इसी के चलते 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 99 और कांग्रेस को करीब 83 सीटें मिल गईं थीं। वहीं, भाजपा के वोट शेयर में 1 प्रतिशत और कांग्रेस के 2 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी। जबकि, मोदी के रहते 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के पास 115 सीटें थीं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस के खाते में 16 सीटें ज्यादा आई थीं, यह फायदा उसे पाटीदार आरक्षण आंदोलन से हुआ था।

2012 में गुजरात के कुल 182 विधायकों में से 50 पाटीदारों को टिकट दिया गया था, जिनमें से 36 ने जीत दर्ज की थी। वहीं, 2017 के चुनाव में बीजेपी के 28 और कांग्रेस के 20 पाटीदार विधायक जीते थे। यानी की 2017 में पाटीदारों की नाराजगी के चलते बीजेपी को 8 सीटों का नुकसान हो गया था।

इन सीटों पर पाटीदार पावर ही चलता है
गुजरात में इन सीटों पर सबसे ज्यादा पाटीदार मतदाता हैं, उनमें उंझा, विसनगर, बहुचराजी, गांधीनगर-उत्तर, मेहसाणा, विजापुर, हिम्मतनगर, माणसा, घाटलोडिया, वेजलपुर, ठक्करबापानगर, नारणपुरा, निकोल, नरोडा, मणिनगर, साबरमती, ध्रांगध्रा, मोरबी, टंकारा, दसक्रोई, विरमगाम, राजकोट-ईस्ट, राजकोट-साउथ, जसदण, गोंडल, जामजोधपुर, माणावदर, जूनागढ़, विसावदर, केशोद, धारी, अमरेली, लाठी, सावरकुंडला, जेतपुर, धोराजी, जामनगर ग्राम्य, कामरेज, सूरत-उत्तर, वराछा, करंज, मजुरा, कतारगाम, लुणावाडा, नाडियाद, डभोई और करजण हैं।

इन 21 सीटों पर पाटीदारों का प्रभुत्व
इसके साथ ही अकोटा, वाघोडिया, रावपुरा, मांजलपुर, तलाजा, रापर, जामनगर-साउथ, भावनगर ग्राम्य, बोरसद, आंकलाव, मातर, महुधा, कपडवंज, पादरा, नांदोद, जंबुसर, भरूच, नवसारी, शहेरा, कलोल, बापूनगर की सीटों पर भी पाटीदारों का दबदबा है। गुजरात में फिलहाल बीजेपी के 44 विधायक, 6 सांसद और राज्यसभा में तीन सांसद पाटीदार हैं।

निकाय चुनाव कांग्रेस की बजाय 'आप' को मिला पाटीदारों का सपोर्ट
बता दें, आम आदमी पार्टी ने गुजरात के निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। खासकर सूरत नगर निगम चुनाव में पाटीदारों के वर्चस्व वाले इलाके में 27 सीटों पर जीत हासिल की थी। हालांकि, ये वहीं सीटें थीं, जो 2016 के निकाय चुनाव में कांग्रेस को मिली थीं।

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