भास्कर एक्सप्लेनर:जिग्नेश मेवाणी और कांग्रेस क्यों चाहते हैं एक-दूसरे का साथ? गुजरात की राजनीति में दलित समुदाय का एक नया चेहरा पेश करना है दोनों की प्लानिंग

अहमदाबाद20 दिन पहले
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राहुल गांधी के साथ जिग्नेश मेवाणी। - Dainik Bhaskar
राहुल गांधी के साथ जिग्नेश मेवाणी।

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले पाटीदार-ठाकोर-दलित की त्रिकोणीय राजनीतिक धुरी बन गई थी। इस त्रिकोणीय धुरी के चलते गुजरात में तीन युवा राजनीतिक नेताओं- हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी का राजनीतिक उदय हुआ था। इनमें से हार्दिक और अल्पेश के पास अपने समाज का एक संगठित जनाधार था, लेकिन इस चुनाव में जिग्नेश मेवाणी ने दलितों का एक अलग वोट बैंक स्थापित करके अपनी पहचान बनाई।

इसी पहचान के दम पर 2017 के विधानसभा चुनाव में वडगाम सीट से निर्दलीय विधायक भी चुने गए और अब औपचारिक रूप से कांग्रेस का दामन थामने जा रहे हैं। तो आइए मेवाणी के अब तक के राजनीतिक सफर और उनके कांग्रेस में शामिल होने के कारणों के साथ-साथ उनके शामिल होने के पीछे कांग्रेस के गणित पर नजर करते हैं।

चर्चा है कि कांग्रेस में शामिल होते ही जिग्नेश मेवाणी को गुजरात में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी।
चर्चा है कि कांग्रेस में शामिल होते ही जिग्नेश मेवाणी को गुजरात में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी।

गुजरात में दलित समाज का नया चेहरा
जिग्नेश मेवाणी 2009 से सुरेंद्रनगर में उस समय दलितों का चेहरा बने थे, जब उन्होंने गुजरात की भाजपा सरकार पर भूमिहीन दलितों पर गुजरात कृषि भूमि सीलिंग अधिनियम के तहत भूमि आवंटित नहीं करने का आरोप लगाया था। उनके संगठन जन संघर्ष मंच ने इसके लिए एक सर्वेक्षण किया और 2015 तक वह एक सक्रिय आरटीआई एक्टिविस्ट बन गए थे। मेवाणी का असली राजनीतिक उदय 2016 की घटना के बाद हुआ था, जब ऊना शहर में दलितों के साथ मारपीट की घटना हुई थी। ऊना दलित अत्याचार लड़ाई समिति के गठन से लेकर 30 विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाने में मेवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उसी समय मेवाणी राष्ट्रीय स्तर पर दलितों का उभरता हुआ चेहरा बन गए थे।

2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और 'आप' ने किया था समर्थन
इसके ठीक कुछ समय बाद 2017 के विधानसभा चुनाव आ गए, जिसमें मेवाणी ने उत्तर गुजरात के बनासकांठा जिले में वडगाम अनुसूचित जाति की आरक्षित सीट से अपनी उम्मीदवारी दर्ज की थी। अपने चुनाव को भाजपा के अन्यायपूर्ण शासन के खिलाफ लड़ाई बताते हुए मेवाणी ने अन्य दलों से अपने उम्मीदवार नहीं उतारने की अपील की थी। इसके बाद, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने वडगाम सीट से अपने उम्मीदवारों के नाम वापस लेकर मेवाणी के समर्थन की घोषणा की थी। इस चुनाव में मेवाणी ने 18 हजार वोटों से जीत हासिल की और यहीं से उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई थी।

वर्तमान में गुजरात कांग्रेस में ऐसा कोई दलित नेता नहीं है, जिसका राज्यव्यापी दलित वोटबैंक पर प्रभाव हो।
वर्तमान में गुजरात कांग्रेस में ऐसा कोई दलित नेता नहीं है, जिसका राज्यव्यापी दलित वोटबैंक पर प्रभाव हो।

कांग्रेस में शामिल होने से मेवाणी को क्या फायदा?
चर्चा है कि कांग्रेस में शामिल होते ही जिग्नेश मेवाणी को गुजरात में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी। वर्तमान में गुजरात कांग्रेस में ऐसा कोई दलित नेता नहीं है, जिसका राज्यव्यापी दलित वोटबैंक पर प्रभाव हो। जबकि मेवाणी गिर-सोमनाथ, सुरेंद्रनगर, मेहसाणा, बनासकांठा, पाटण, नवसारी और अन्य क्षेत्रों में दलितों के अधिकारों के लिए लड़ते रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के जरिए मेवाणी दलित वोटबैंक के लिए गुजरात का एक नया चेहरा बन सकते हैं।

2022 में कांग्रेस जीती तो मंत्रीपद, हारी तो विपक्ष का चेहरा
चर्चा है कि मेवाणी लंबे समय तक फायदे के लिए कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। क्योंकि, अगर कांग्रेस 2022 का विधानसभा चुनाव जीत जाती है तो दलित वोटबैंक पर मेवाणी का प्रभाव ही काम आएगा। ऐसे में उनका मंत्री पद तो पक्का ही है। वहीं, कांग्रेस अगर चुनाव में हार भी जाती है तो मेवाणी को नेता प्रतिपक्ष के पद दे सकती है, क्योंकि, कांग्रेस के पास इस समय कोई अन्य बड़ा चेहरा है ही नहीं।

मेवाणी को शामिल करने से कांग्रेस को क्या फायदा?
वहीं दूसरी ओर जहां तक ​​गुजरात कांग्रेस का सवाल है, वर्तमान परिस्थितियों में पार्टी का दलित नेतृत्व में नौशाद सोलंकी और शैलेश परमार के अलावा कोई बड़ा नाम नहीं है। इसके अलावा इनका प्रभाव राज्य स्तरीय भी नहीं है। ऐसे में मौजूदा हालात में मेवाणी को शामिल कर कांग्रेस पार्टी से दूर हो रहे दलित समर्थकों में नई ऊर्जा का संचार कर सकती है और अपने उन मतदाताओं को वापस ला सकती है, जिन्होंने पिछले कुछ सालों से भाजपा का दामन थाम रखा है।

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