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  • A Hundred Salutes To The Service Of Doctors staff Of Civil Kovid Hospital, But Even This Pain Of The Relatives Of The Corona Dead Cannot Be Hidden.

कोरोना से लड़े, लापरवाह सिस्टम ने मारा:सिविल कोविड अस्पताल के डॉक्टर्स-स्टाफ की सेवा को सौ-सौ सलाम, लेकिन मृतकों के परिजन का ये दर्द भी छिपाया नहीं जा सकता

अहमदाबाद7 दिन पहले
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कोरोना की दूसरी लहर अप्रैल में चरम पर थी। तब मरीजों को अस्पतालों में ICU और ऑक्सीजन बेड नहीं मिल रहे थे। बेड मिल भी जाए तो ऑक्सीजन नहीं मिलती थी। मरीज के परिवार वाले दर-दर ठोकरें खाते हुए गैस के सिलेंडर खोज रहे थे और भारी-भरकम राशि चुका रहे थे। इलाज के लिए कई ने तो गहने-जेवर तक गिरवी रखे।

इन हालात को बयां करने के लिए सोमवार को हमने 'भास्कर एक्सपोज' के तहत अहमदाबाद सिविल अस्पताल में कोरोना इलाज के दौरान मरने वालों के आंकड़ों का खुलासा किया था। आज इसी के दूसरे पार्ट में हम आपको कुछ ऐसे मरीजों के बारे में बता रहे हैं, जिनसे हमने बात की और उनसे जानना चाहा कि उस दौरान वे किस भयानक तकलीफ से गुजरे थे। हमारी अहमदाबाद की टीम ने ऐसे 100 मरीजों से फोन पर बात की है, जिनकी रिकॉर्डिंग भी हमारे पास मौजूद है।

इसके पीछे हमारी मंशा 1,200 बेड वाले अहमदाबाद के सबसे बड़े सिविल अस्पताल के डॉक्टर्स, नर्स या अन्य पैरामेडिकल स्टाफ का मनोबल तोड़ना नहीं है। सिविल कोविड के डॉक्टर्स और स्टाफ की मेहनत और उनके त्याग को सैकड़ों सलाम। क्योंकि इन कोरोना वॉरियर्स ने मरीजों की सेवा में दिन-रात एक कर दिए। लेकिन, इसके बावजूद कोरोना की दूसरी लहर में हालात इतने बदतर हो चले थे कि हमें उस दर्द को जानना भी जरूरी है। हम सिर्फ उन मरीजों के दर्द को बयां कर रहे हैं, जिन्होंने कोरोना के दौर में न सिर्फ अपनों को खोया, बल्कि उस समय के भीषण हालात से भी दो-चार हुए।

आधी रात को बुलाया और साइन करवाकर डेड बॉडी सौंप दी
एक कोरोना मृतक के परिवार वाले ने बताया कि हमें अस्पताल से आधी रात को फोन आया। अस्पताल पहुंचे तो हमें एक चिट्ठी पकड़ा दी और रजिस्टर में साइन करवाने के बाद हमसे शव ले जाने को कह दिया गया। इसके साथ ही कोरोना के प्रोटोकॉल के तहत ही अंतिम संस्कार करने के लिए कहा गया।

हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि रात को डेड बॉडी घर ले जाना और फिर दूसरे दिन प्रोटोकॉल के अनुसार अंतिम संस्कार करना। सामान्य परिस्थितियों में किसी भी अस्पताल में रात के समय शव किसी को भी नहीं सौंपा जाता है, लेकिन कोरोना काल में यह पूरी प्रक्रिया रात में ही कर दी गई। आखिर क्यों?

खून पाइप से बह रहा था
एक सरकारी अधिकारी के शब्दों में, ‘मेरे पिता और दादी दोनों का अप्रैल में सिविल अस्पताल में निधन हो गया था, लेकिन लिखित में यह नहीं बताया गया कि उनकी मौत कोरोना से हुई है। कोरोना रिपोर्ट पॉजीटिव आने के बाद मेरे पिता का इलाज के दौरान दूसरे दिन ही निधन हो गया था।

इतना ही नहीं, मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि जब दादी को बोतल चढ़ाई जा रही थी, तब बोतल जमीन पर घिसट रही थी। यहां तक कि बोतल में लगे पाइप के जरिए दादी के शरीर से करीब 50 ml ब्लड जमीन पर बह चुका था। कुछ दिनों बाद उनकी भी मौत की सूचना मिली, लेकिन मौत का कारण कोरोना नहीं बताया गया।

आखिरी कॉल सिर्फ डेड बॉडी लेने के लिए आया था
कोरोना की दूसरी लहर में पति को खोने वाली एक महिला ने बताया कि सिविल अस्पताल का हाल अंधेर नगरी चौपट राजा वाला था। मरीज को मामूली परेशानी होने पर भी इंजेक्शन लगा दे रहे थे। ये तो छोड़िए, मरीज की मौत के बाद उसका मेडिकल नोट लेने के लिए भी चक्कर पे चक्कर लगाने पड़े। यहां के रिकार्ड रूम में फाइलों का अंबार था, लेकिन कोई ध्यान देने वाला नहीं था।

महिला ने कहा कि मेरे पति को 19 अप्रैल को भर्ती कराया गया और उसी रात उन्हें ICU में ले जाया गया, लेकिन किसी ने हमें कुछ नहीं बताया। दो दिन बाद उनकी हालत बिगड़ गई। हम लगातार हेल्पडेस्क पर कॉल करते रहे, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। बस आखिरी कॉल सिर्फ डेड बॉडी लेने के लिए आया था।

मां की मौत डेढ़ घंटे में ही हो गई थी, आज तक कारण नहीं बताया
एक मृतक महिला के बेटे ने कहा, 'सिविल कोविड में भर्ती होने के डेढ़ घंटे के भीतर ही मेरी मां की मौत हो गई थी। आज तक हमें कोई फाइल नहीं दी गई। यह तो छोड़िए, हमें आज तक यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें कौन सी दवा दी गई थी। मैंने कितनी बार कहा है कि मुझे फाइलें दे दो, मुझे फाइल दूसरे डॉक्टर को दिखानी है कि उन्हें कोरोना था या नहीं, और भर्ती होने के डेढ़ घंटे के भीतर उसकी मौत कैसे हुई। लेकिन अभी तक किसी ने जवाब नहीं दिया। डेथ सर्टिफिकेट भी नहीं मिल सका है।’

डेथ सर्टिफिकेट में मौत का कारण ही नहीं लिखा
इस इंवेस्टिगेशन स्टोरी के जरिए दैनिक भास्कर ने यह पता लगाया है कि किस तरह राज्य सरकार ने मौत के सही आंकड़े छिपाने की कोशिश की है। इसके लिए हमने अहमदाबाद सिविल में में 10 अप्रैल से 9 मई तक राज्य सरकार के कोरोना से मरने वालों की संख्या की जांच की। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 30 दिनों में अहमदाबाद में कुल 698 और राज्य में 3,578 मौतें हुईं थीं, जबकि हमारी जांच में सामने आया कि अकेले सिविल अस्पताल में ही 3,416 मरीजों की मौत हुई थी।

इन सभी मरीजों को उनकी कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। यहां तक ​​कि जिन्हें सिविल अस्पताल से मृत्यु प्रमाण पत्र या डेथ नोट दिया गया है, उन्हें भी कोरोना से मौत का कारण नहीं बताया गया है। कई में तो मौत का कारण ही नहीं लिखा है।