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शोक:दीक्षा दानेश्वरी आचार्य गुणरत्न सूरी महाराज का हुआ कालधर्म

सूरत10 महीने पहले
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  • 451 दीक्षाओं का श्रेय, 21 वर्ष की आयु में अपनी सगाई छोड़कर ली थी दीक्षा

451 से दीक्षा प्रदान करने वाले, दीक्षा दानेश्वरी और सूरी प्रेम कृपा पात्र आचार्य भगवंत विजय गुणरत्न सूरीश्वर महाराज का मंगलवार काे 88 वर्ष की आयु में देवलोक गमन हो गया। उन्होंने मंगलवार को भोर 3:20 बजे कैलाश नगर जैन संघ में इह लोक का त्याग किया। उनका महाप्रयाण जैन समाज के लिए अपूर्णीय क्षति हैं। 

ये भी अद्भुत संयोग हैं कि दीक्षा दानेश्वरी महाराज ने अपने अंतिम समय में उसी भूमि का चयन किया जिसमें दादा गुरुदेव राम सूरी ने चुना था और उनका महाप्रयाण भी कैलाश नगर के उसी उपाश्रय में हुआ जिसमें परम उपकारी तपागच्छाधिपति आचार्य विजय रामसूरीश्वर महाराज को काल धर्म प्राप्त हुआ था। ये संयोग हैं कि अपने गुरु के निर्वाण स्थान और अंतिम संस्कार स्थान को ही दीक्षा दानेश्वरी गुरुदेव ने अपना अंतिम स्थान बनाया।

1932 में राजस्थान के पारली, जिला जालौर में हुआ था जन्म

दीक्षा दानेश्वरी आचार्य विजय गुणरत्न सूरीश्वर महाराज का सांसारिक नाम गणेशमल हीराचंद था। उनके पिता हीराचंद जेरूपभाई और माता माता मनुबाई हीराचंद थीं। विक्रम संवत 1989, पोष सुद 4, ई. सन 1932 में पादरली, जिला जालोर, राजस्थान में उनका जन्म हुआ था। उन्हाेंने विक्रम संवत 2010, महा सुद 4, ई. सन 1954 में मुंबई में आचार्य विजय जितेन्द्र सूरीश्वर महाराज से दीक्षा ली और बड़ी दीक्षा विक्रम संवत 2010, महावद 7, ई. स 1954 में मुंबई में ली थी। उनकाे सन 1985 में अमदाबाद में गणि पद, पंन्यास पद सन 1988 में जालोर राजस्थान में प्राप्त हुआ।

1988 में उन्हाेंने आचार्य पद पादरली, राजस्थान में प्राप्त किया था। 21 वर्षनी युवास्था में उन्हाेंने सगाई छोड़कर कर दीक्षा ली थी। श्री जीरावला तीर्थ में 3200 व्यक्तियाें की सामूहिक चैत्री ओलीजी की आराधना की। आचार्य 28 युवक- युवतियाें की सूरत में, 38 युवक-युवतियों की पालिताणा में सामूहिक दीक्षा के साथ अभी तक कुल 451 दीक्षाओं के दीक्षादाता रहे। श्री शंखेश्वर महातीर्थ में 4700 अठ्ठम और 1700 आराधकों का ऐतिहासिक उपधान तप का श्रेय भी उन्हें है। इसके अलावा पालिताणा घेटी की पाग के बीच 2200 आराधकों की नव्वाणुं यात्रा की उपलब्धि है। वहीं सूरत दीक्षा में 51000,  पालिताणा दीक्षा में 52000 और अमदाबाद में 55000 युवाओं की समूह सामायिक का श्रेय भी है। उनके शिष्य परिवार में आचार्य रविरत्नसूरी, आचार्य रश्मिरत्नसूरी, आचार्य पुण्यरत्नसूरी, आचार्य यशोरत्नसूरी, आचार्य जिनेशरत्नसूरि आदि शामिल हैं।

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