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चुनाव से 5 महीने पहले भाजपा सरकार का फैसला:गुजरात में पार-तापी-नर्मदा लिंक प्रोजेक्ट रद्द; आदिवासियों के विरोध के बाद CM पटेल की घोषणा

सूरतएक महीने पहले
10,211 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को वर्ष 2010 में मंज़ूरी दी गई थी। - Dainik Bhaskar
10,211 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट को वर्ष 2010 में मंज़ूरी दी गई थी।

दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के विरोध को देखते हुए आखिरकार गुजरात सरकार ने प्रस्तावित पार-तापी नर्मदा लिंक परियोजना रद्द करने का घोषणा कर ही दी। सूरत में आज मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और गुजरात भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल की संयुक्त प्रेस वार्ता हुई। इसमें मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने प्रोजेक्ट को रद्द करने का ऐलान किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आदिवासी समुदाय की भावनाओं के सम्मान में इस परियोजना को रद्द किया जा रहा है। बता दें, आदिवासी समुदाय इस प्रोजेक्ट का लंबे समय से विरोध कर रहा था। गुजरात में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस परियोजना के चलते बीजेपी सरकार को आदिवासी वोट बैंक के छिटक जाने का खतरा पैदा हो गया था।

सूरत में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम भूपेंद्र पटेल ने घोषणा की।
सूरत में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम भूपेंद्र पटेल ने घोषणा की।

गुजरात सरकार ने प्रोजेक्ट को अनुमति नहीं दी थी : सीएम
सूरत के सर्किट हाउस में आयोजित प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने कहा कि यह केंद्र सरकार की योजना थी। राज्य सरकार से इसकी स्वीकृति मांगी गई थी, लेकिन हमने अब तक इसकी मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद भी आदिवासी समाज में राज्य सरकार के खिलाफ गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की गई। इसीलिए गुजरात सरकार के मंत्रियों व विधायकों के मंत्रिमंडल ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सामने अपनी बात रखी और इस परियोजना को बंद करने का विचार किया गया।

राज्य सरकार आदिवासी समाज के साथ थी : CM
सीएम पटेल ने आदिवासियों के लिए राज्य सरकार की तरफ से चलाई जा रहीं कई योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा - इस प्रोजेक्ट का विचार केंद्र सरकार की तरफ से सर्वे कराने के बाद ही तैयार किया गया था। लेकिन, उस समय भी राज्य सरकार आदिवासी समाज के साथ थी। इसलिए मंजूरी नहीं दी गई। इसके बावजूद विपक्षी पार्टियों ने लोगों में भ्रांति पैदा करने की कोशिश की।

प्रोजेक्ट में उत्तर महाराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में प्रस्तावित सात जलाशय शामिल थे।
प्रोजेक्ट में उत्तर महाराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में प्रस्तावित सात जलाशय शामिल थे।

केंद्रीय मंत्रियों का भी परिचय कराया गया
रिवर लिंक परियोजना के लिए गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को प्रतिनिधित्व देने के लिए गुजरात भाजपा के आदिवासी नेता दिल्ली पहुंचे। सरकार के मंत्रियों और विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली गया और इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को आदिवासी समुदाय की भावनाओं से अवगत कराया। केंद्र सरकार ने तब इस परियोजना को निलंबित कर दिया था।

प्रोजेक्ट के विरोद में पीएम मोदी के लिए पोस्टकार्ड लिखे गए
हाल ही में तापी के सोनगढ़ में आदिवासी समुदाय द्वारा एक रैली का आयोजन किया गया था। इस दौरान पीएम मोदी के नाम 1111 पोस्टकार्ड लिखकर भी इस प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग की गई थी। आदिवासी समुदाय की इस रैली को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया था। रैली में वासंदा के विधायक अनंत पटेल समेत कांग्रेस के कई नेता मौजूद थे।

प्रोजेक्ट के जरिए सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी भेजा जाना था।
प्रोजेक्ट के जरिए सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी भेजा जाना था।

10,211 करोड़ रुपए की थी परियोजना
इन परियोजनाओं को वर्ष 2010 में मंजूरी दी गई थी, जब केंद्र सरकार, गुजरात और महाराष्ट्र के बीच त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना के जरिए पश्चिमी घाट के पानी को सौराष्ट्र और कच्छ के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भेजा जाना था।

इस लिंक परियोजना में उत्तर महाराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में प्रस्तावित सात जलाशय शामिल थे। सात प्रस्तावित जलाशयों का जल 395 किमी. लंबी नहर के जरिए सरदार सरोवर परियोजना (नर्मदा पर) से छोटे रास्ते के क्षेत्रों की सिंचाई करते हुए लिया जाना था।

इस योजना में प्रस्तावित सात बांध झेरी, मोहनकवचली, पाइखेड़, चसमांडवा, चिक्कर, डाबदार और केलवान थे। इससे सरदार सरोवर का पानी बचता, जिसका उपयोग सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में सिंचाई के लिए किया जाता। इस लिंक में मुख्य रूप से सात बांधों तीन डायवर्ज़न वियर, दो सुरंगों, 395 किमी. लंबी नहर, 6 बिजली घरों और कई क्रॉस-ड्रेनेज कार्यों के निर्माण की परिकल्पना भी की गई थी।

लंबे समय से दक्षिण गुजरात के आदिवासी समाज इसका विरोध कर रहा था।
लंबे समय से दक्षिण गुजरात के आदिवासी समाज इसका विरोध कर रहा था।

आखिर आदिवासी और किसान क्यों कर रहे थे विरोध?
आदिवासी नेताओं का कहना है कि महाराष्ट्र के डांग, वलसाड और नासिक जिले में छह जलाशय विकसित होने से गुजरात के करीब 50,000 लोग सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इनमें से तीन बांध डांग में, एक वलसाड में और दो महाराष्ट्र में विकसित किए जाने थे।

डांग जिले के वाघई तालुका में बनने वाले तीन बांधों के डूब क्षेत्रों में कम से कम 35 गांव पूरी तरह से जलमग्न होने का खतरा था। आदिवासियों का कहना था कि नदी जोड़ने की परियोजना की लागत 10,211 करोड़ रुपए है और अगर सरकार सौराष्ट्र और कच्छ में सिंचाई के लिए बड़े बांध बनाना चाहती है तो उन्हें वहां इन बांधों को विकसित करना चाहिए। यहां बांध बनाने और वहां पानी लेने का कोई मतलब नहीं है।

सैकड़ों आदिवासी विस्थापित होंगे
आदिवासी नेताओं का यह भी कहना है कि केंद्र ने नर्मदा योजना की विफलता को छिपाने के लिए परियोजना को डिजाइन किया है। परियोजना के परिणामस्वरूप डांग, वलसाड और तापी जिलों में सैकड़ों आदिवासी विस्थापित होंगे। सागौन और बांस और अन्य लकड़ियों से भरपूर डांग के जंगल जलमग्न हो जाएंगे।

आदिवासी नेताओं का कहना है कि उन्होंने नर्मदा योजना, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, उकाई आदि जैसी कई परियोजनाएं देखी हैं, जहां आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित होने के लिए मुआवजा दिया जाना बाकी है।