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टीबी से 9 गुना घातक कोरोना:टीबी 6-7 माह में फेफड़ों को जितना डैमेज करती है, कोरोना सिर्फ 3 हफ्ते में करता है

सूरत13 दिन पहले
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  • कोरोनाकाल में ऐसी दो बीमारियों की पड़ताल, जो फेफड़ों के लिए खतरनाक हैं

(सूर्यकांत तिवारी) अब तक टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) को ही फेफड़ों पर सीधा हमला करने वाली खतरनाक बीमारी माना जाता था, लेकिन कोविड-19 (कोरोना) बीमारी इससे 9 गुना ज्यादा खतरनाक है। मोटे तौर ऐसे समझ सकते हैं कि कोरोना तीन से चार हफ्ते में फेफड़ों को जितना डैमेज (फाइब्रोसिस) करता है उतना करने में टीबी को छह से सात माह का समय लग जाता है।

वायरस जनित कोरोना कितना घातक है यह जानने के लिए बैक्टीरिया जनित टीबी से तुलना की तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।सिविल और स्मीमेर अस्पताल के विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के कारण फेफड़ों में माइनर दाग आने पर ही सर्दी, खांसी, बुखार, बलगम, सांस आदि समस्याएं शुरू हो जाती हैं। जबकि टीबी में फेफड़ों में माइनर दाग आने पर भी मरीज को कुछ खास पता नहीं चलता। फेफड़ों में संक्रमण 15 फीसदी होने पर कोरोना के लक्षण दिखने लग जाते हैं।

पर टीबी में मरीज को पता भी नहीं चलता। कोरोना होने पर दो से तीन दिन में इन्वॉल्वमेंट तेजी से बढ़ने शुरू हो जाते हैं पर टीबी में दो से तीन माह का समय लगता है। बता दें कि सूरत में हर दिन टीबी से चार लोगों की मौत हो जाती है, जबकि इस समय कोरोना से भी औसतन इतनी ही मौतें हो रही हैं।

कोरोना: 2-3 दिन में फास्ट अटैक शुरू करता है, 10 से 12 दिन में रिकवरी संभव

दो से तीन दिन में फास्ट अटैक शुरू करता है, लंग्स इन्वॉल्वमेंट तेजी से बढ़ता है। इनेक्टिविटी 93 फीसदी (संक्रमित के संपर्क में आने से 93% संक्रमण की आशंका तीन से चार दिन में सीटी स्कैन या एक्सरे में पैच (दाग) दिख जाते हैं। अमूमन 10 से 12 दिन में रिकवरी हो जाती है। मौजूदा मृत्युदर 3 से 4 फीसदी है।

15 फीसदी से ज्यादा लंग्स इन्वॉल्वमेंट के कारण हुए फाइब्रोसिस (दाग) जीवनभर के लिए रह सकते हैं। 50 से 60 फीसदी फाइब्रोसिस होनेपर सांस की समस्या बनी रहेगी। फेफड़ों में 10 फीसदी इन्वॉल्वमेंट होने के बाद इलाज शुरू हुआ तो भी इन्वॉल्वमेंट बढ़ सकता है। इलाज में एंटीबायोटिक, फेफड़े की नसें ब्लॉक होने से खून पतला करने के लिए इंजेक्शन, इम्युनिटी के लिए स्टेरॉइड, रैमडेसिवीर, विटामिन सी दिया जाता है।

इलाज नहीं मिलने पर मौत हो ही जाती है इसका कोई रिसर्च नहीं मिला है। सर्दी, खांसी, बुखार, कमजोरी, सांस की समस्या जैसे लक्षण दिखते हैं। 30 से 40 फीसदी लंग्स इन्वॉल्वमेंट होने पर ऑक्सीजन की जरूरत होती है।

टीबी: पता लगने में 2 से 3 महीने तक लग जाते हैं, रिकवरी में महीनों लगते हैं

दो से तीन माह के बाद लंग्स इन्वॉल्वमेंट पता चलता है। टीबी इनेक्टिविटी 10 से 15 फीसदी (संक्रमित के संपर्क में आने पर संक्रमण की आशंका नहीं होती)। तीन से चार माह में सीटी स्कैन या एक्सरे में पैच (दाग) दिख जाते हैं सामान्यतः तौर पर 6 माह से 18 माह में रिकवरी हो जाती है।

15 से 20 फीसदी लंग्स इन्वॉल्वमेंट होने के कारण हुए फाइब्रोसिस कुछ महीने बाद खत्म हो जाते हैं। 50 से 60 फीसदी फाइब्रोसिस होने पर सांस की समस्या नहीं रहती है। 15 से 20 फीसदी इन्वॉल्वमेंट होने के बाद इलाज शुरू हुआ तो इन्वॉल्वमेंट आगे नहीं बढ़ेगा। ट्रीटमेंट में 4 से 10 गोलियां दी जाती हंै। कई प्रमाणित दवाई बाजार में उपलब्ध हैं।

इलाज नहीं मिलने पर 50 फीसदी मरीजों की मौत तय, मृत्यु दर 5 फीसदी के करीब है। खून वाली बलगम के साथ पुरानी खांसी, बुखार, रात को पसीना आना और वजन घटना जैसे लक्षण दिखते हैं। 40 से 50 फीसदी लंग्स इन्वॉल्वमेंट होने पर ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है।

अब भी... टीबी के मरीज दूसरी या तीसरी स्टेज पर आते हैं, तब स्थिति गंभीर
सूरत में हर दिन 40 से 50 नए केस टीबी के आते हैं। औसतन 4 मरीजों की मौत हो जाती है। अकेले सिविल अस्पताल में दो से तीन मरीजों की मौत हो रही है। दूसरी ओर कोरोना के हर दिन 250 से अधिक केस आ रहे हैं और औसतन 4 की मौत हो रही है।

डॉक्टर बताते हैं कि कोरोना को लेकर बहुत तेजी से लोगों में जागरूकता आई है, लेकिन टीबी के मरीज अक्सर ही दूसरे या तीसरे स्टेज पर आते हैं। इतनी पुरानी बीमारी होने के बावजूद इलाज में भी बहुत लापरवाही करते हैं।

टीबी के लिए अच्छी बात यह कि इसकी दवाई है
कोरोना और टीबी की तुलना इतना आसान नहीं है। टीबी बहुत से प्रकार की होती है। अगर कोरोना और टीबी की लंग्स इन्वॉल्वमेंट से तुलना की जाए तो कोरोना तीन से चार हफ्ते में जितना लंग्स इन्वाल्व मेंट के कारण फाइब्रोसिस करता है। टीबी में फाइब्रोसिस करने में छह से सात माह का समय लगता है। कोरोना के लिए कोई वैक्सीन नहीं आई है। पर टीबी के लिए कई तरह की दवाएं उपलब्ध हैं।
डॉ. पारुल वडगामा, एचओडी टीबी चेस्ट विभाग, सिविल अस्पताल

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