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सिविल का हाल:इमरजेंसी में भी वेटिंग, अब सीएमओ के आदेश पर मरीज जा रहे डॉक्टर के पास

सूरतएक महीने पहले
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मरीज घंटों तक स्ट्रेचर पर ही पड़ा रहा। - Dainik Bhaskar
मरीज घंटों तक स्ट्रेचर पर ही पड़ा रहा।
  • नॉन एमएलसी केस भी सीएमओ ही देखेंगे, मरीजों की लग रही लंबी लाइन

सिविल अस्पताल में प्रबंधन के आदेश के बाद ट्रॉमा सेंटर में मरीजों की परेशानी बढ़ गई है। मेडिकल ऑफिसर को नॉन एमएलसी केस देखने का आदेश दिया गया है, इससे मरीजों के इलाज में देरी हो रही है। इमरजेंसी में भी लंबी वेटिंग है। पहले आसानी से मरीजों का इलाज हो जाता था, अब सीएमओ के आदेश के बाद ही डॉक्टरों के पास जा रहे हैं।

ट्राॅमा सेंटर में जब अधिक मरीज होते हैं तब गंभीर मरीजों के इलाज में घंटों देरी होती है। हालांकि समस्या को देखते हुए एक और मेडिकल ऑफिसर को ड्यूटी पर रखा गया है। इससे मरीजों को कुछ राहत मिल रही है।वहीं, अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि नॉन एमएलसी के मरीज सीधे इलाज करवाने डॉक्टर के पास जाते थे।

इससे सर्जरी, ऑर्थो और मेडिसिन विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर आपस में लड़ने लगते थे। डॉक्टर आपस में न लड़ें इसलिए मेडिकल ऑफिसर को मरीजों को संबंधित विभाग में भेजने का आदेश दिया गया है। मेडिकल ऑफिसर मरीज को जिस विभाग में रेफर करेगा उसका वहीं इलाज होगा।

सिविल अस्पताल के अधीक्षक डॉ. शैलेष पटेल ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर में मरीजों को देखने के बाद अलग-अलग विभाग में रेफर किया जाता था। हालांकि इन दिनों रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी है, इसलिए मरीजों को देखने में परेशानी हो रही है।

प्रबंधन: सर्जरी, ऑर्थो, मेडिसिन के डॉक्टर आपस में न उलझें इसलिए ऐसे नियम बनाए

केस 1

अडाजण में हादसे में गंभीर रूप से घायल पोपटभाई को परिवारवाले 108 एंबुलेंस से इलाज कराने सिविल लेकर आए थे। सिर और पेर में चोट लगने की वजह से स्ट्रेचर पर लिटाया गया था। इलाज के लिए माइनर ऑपरेशन थिएटर में ले जाना था, पर पहले एमएलसी केस के लिए परिवार वाले सीएमओ के पास गए।

वहां पहले से ही कई मरीज लाइन में खड़े थे। लंबे समय के बाद सीएमओ ने पोपटभाई को सर्जरी विभाग में रेफर किया। इसके बाद इलाज शुरू हुआ। डॉक्टरों ने सिर का सिटी स्कैन कराया। सिर में गंभीर चोट लगी थी। मरीज स्ट्रेचर पर पड़ा था, केस पेपर की वहज से डॉक्टर ओटी में नहीं ले रहे थे। सीएमओ के पास से केस पेपर आने के बाद डॉक्टरों ने मरीज को अंदर लिया।

केस 2

पांडेसरा की आविर्भाव सोसाइटी में रहने वाला अमित शर्मा सिविल में पेट दर्द का इलाज करवाने गया था। केस पेपर निकालने के बाद पता चला कि ट्रॉमा सेंटर में इलाज होगा। अमित शर्मा ट्रॉमा सेंटर के कैजुअलिटी में गया तो डॉक्टरों ने उसे सीएमओ के पास भेज दिया। सीएमओ पहले से ही तीन मरीजों को देख रहे थे।

आधा घंटा बाद अमित शर्मा को मेडिसिन विभाग में रेफर किया गया। बता दें अमित शर्मा फिर से उन्हीं डॉक्टरों के पास आया जहां से उसे सीएमओ के पास भेजा गया था। इस भागमभाग में मरीज की परेशान और बढ़ गई। पहले मरीजों का अासानी से इलाज हो जाता था, अब सीएमओ के आदेश के बाद डॉक्टर इलाज कर रहे हैं।

अतिरिक्त सीएमओ इस्तीफा देने को तैयार, परेशानी और बढ़ेगी
सिविल में एक ही सीएमओ एमएलसी (मेडिको लीगल केस) और नॉन एमएलसी दोनों प्रकार के मरीजों को देख रहे हैं। इससे मरीजों को देखने में काफी समय लग रहा था। उनकी मदद के लिए एक और सीएमओ को नाॅन एमएलसी मरीजों को देखने के लिए ड्यूटी पर रखा गया है।

ड्यूटी करने वाले अतिरिक्त सीएमओ आगे की पढ़ाई करने के लिए सिविल से इस्तीफा देने पर भी विचार रहे हैं। इससे सीएमओं पर एक साथ मरीजों का पूरा भार आ जाएगा। हालांकि अस्पताल प्रबंधन इस समस्या से निजात पाने पर विचार-विमर्श कर रहा है।

डॉक्टर बहाना नहीं बना सकते
सर्जरी, ऑर्थो और मेडिसिन विभाग के डॉक्टर मरीजों के इलाज को लेकर आपस में लड़ते थे। मरीजों का इलाज नहीं करते थे। इससे मरीजों को घंटों इधर से उधर चक्कर लगाने पड़ते थे। मरीजों को परेशानी न हो इसलिए मेडिकल ऑफिसर नियुक्त कर दिया है, जो प्राथमिक जांच करने के बाद मरीजों को सीधे विभाग में रेफर कर देगा।

सीएमओ के रेफर करने के बाद डॉक्टरों को इलाज करना ही होगा। कोई बहाना नहीं बना सकते हैं। जिन सीएमओ को जिम्मेदारी सौंपी गई है, अगर वे इस्तीफा देते हैं तो अलग प्लान बनाएंगे। हर महीने बैठक करेंगे ताकि कोई परेशानी न हो।
-डॉ. शैलेष पटेल, अधीक्षक, सिविल अस्पताल

रेजिडेंट डॉक्टर बोले- केस पेपर मिलते ही इलाज शुरू कर देते हैं
रेजिडेंट डॉक्टरों और सीएमओ के अपने-अपने तर्क हैं। रेजिडेंट डॉक्टरों का कहना है कि सीएमओ जब तक रेफर नहीं करते तब तक हमें इलाज करने का अधिकार नहीं है। केस पेपर मिलते ही हम मरीज का इलाज शुरू कर देते हैं। पहले ऐसा नहीं था। मरीज के आने के बाद हम इलाज शुरू कर देते थे। इसके बाद तय होता था कि मरीज को किस विभाग में भेजना है।

वहीं, सीएमओ का कहना है कि मरीजों की संख्या अधिक होने की वजह से उन्हें अलग-अलग विभागों में भेजने में देरी हो रही है। मरीज की स्थिति जाने बिना हम उन्हें नहीं भेज सकते हैं। पहले केवल एमएलसी के मरीज ही देखते थे, नॉन एमएलसी वालों का सीधा इलाज होता था।

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