इंसानियत / सूरत से दाहोद जाते समय हमने 20 वाहन बदले, किसी ने हमसे किराया नहीं मांगा

सूरत से दाहोद के लिए निकला श्रमिक परिवार सूरत से दाहोद के लिए निकला श्रमिक परिवार
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सूरत से दाहोद के लिए निकला श्रमिक परिवारसूरत से दाहोद के लिए निकला श्रमिक परिवार

  • कई वाहन चालक हमारी मदद को आगे आए
  • कोरोना ने हमें सूरत के प्लेग की याद दिला दी

दैनिक भास्कर

Mar 26, 2020, 04:14 PM IST

वडोदरा. सोमवार को सूरत से दाहोद जाने के लिए पैदल निकले आदिवासी परिवार ने रास्ते में 20 वाहन बदले, पर किसी वाहन चालक ने उनसे किराए की मांग नही की। कई वाहन चालक तो उनकी सहायता के लिए आगे आए। इससे लगता है कि देश में इंसानियत अभी भी जिंदा है।

खाने के नाम पर बिस्किट्स के अलावा कुछ नहीं
सूरत में मकान निर्माण का काम करने वाले दाहोद जिले के लिमड़ी गांव के प्रकाश भाई डांगी ने बताया कि होली के बाद मैं पत्नी रमीला के साथ सूरत आ गया। यहां हम एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मकान निर्माण का काम करते थे। मेरे साथ मेरे ही गांव के तेरसिंग बारया, पिंटू कडीजा और शंकर हठीला भी अपने परिवार के साथ आए थे। हमारा काम शुरू होते ही करोना के कारण काम फिर बंद हो गया। इसलिए हमने वापस गांव जाने का मन बनाया। हम सब सोमवार को सूरत से निकले। इस दौरान हमने करीब 20 वाहन बदले। हमें खाने के नाम पर बिस्किट्स के अलावा कुछ नहीं मिला। हम जिस वाहन पर बैठते, कुछ दूर जाकर वह दूसरे मार्ग पर चला जाता। इस तरह से वाहन बदलते-बदलते हम आगे बढ़ते रहे,पर यह देखकर अच्छा लगा कि किसी वाहन चालक ने हमसे किराया नहीं मांगा। इसके विपरीत कई वाहन चालकों ने हमें रुपए देकर मानवता दिखाई। इससे लगता है कि इंसानियत आज भी जिंदा है।

एक गांव में हमें खिचड़ी खिलाई
हम आगे बढ़ते जाते, कई बार पैेदल, तो कई बार किसी वाहन के सहारे। ऐसे में एक गांव में एक व्यक्ति ने हम सबको खिचड़ी खिलाई। गोल्डन चौकड़ी से हमें पुलिस ने लिमड़ी तक पहुंचाया। हमारे साथ और कई लोग भी शामिल हो गए थे। इस तरह के हालात ने हमें सूरत में फैले प्लेग की याद दिला दी। तेर सिंह ने बताया कि सूरत में जब प्लेग की बीमारी फैेली थी, तब मैं काफी छोटा था। मेरे पिता सूरत में काम करते थे। तब वे सूरत से इसी तरह वापस गांव आए थे।

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