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स्वास्थ्य सेवाओं के हालात:12.50 लाख आबादी पर एक भी न्यूरो सर्जन, किडनी व हार्ट स्पेशलिस्ट नहीं, स्टाफ नर्स के भी 53 प्रतिशत पद खाली

कैथल4 दिन पहलेलेखक: विक्रम पूनिया
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  • जिले में डाॅक्टराें के कुल 147 स्वीकृत पदों में से 56 पर ही तैनाती, सरकारी अस्पताल में अल्ट्रासाउंड की सुविधा नहीं

जिले में इन दिनों स्वास्थ्य सेवाओं का बुरा हाल है। 12.50 लाख की आबादी के जिले में हालात ये हैं कि एक भी न्यूरो सर्जन, किडनी, कैंसर व हार्ट स्पेशलिस्ट तक नहीं है। इतना ही नहीं डाॅक्टरों के 62 और स्टाफ नर्स के 53 प्रतिशत पद भी खाली पड़े हैं। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिला में लोगों को कितना बेहतर इलाज मिल रहा होगा।

पूरे जिले में डाॅक्टर्स के 147 पद स्वीकृत हैं। इन पदों पर इन दिनों 56 डाॅक्टर ही कार्यरत हैं। इसी तरह से स्टाफ नर्स के 176 पद स्वीकृत हैं और उनमें से 94 पद खाली पड़े हैं। इसके अलावा जिला भर के सरकारी अस्पतालों में पैरा मेडिकल स्टाफ के भी आधे से ज्यादा पद खाली पड़े हैं।

सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि जिले के किसी भी सरकारी अस्पताल में इस समय अल्ट्रासाउंड की सुविधा मुहैया नहीं है। पिछले 8 साल से जिले में रेडियोलॉजिस्ट का पद खाली पड़ा है। इसके कारण सरकारी आने वाले मरीजों को बिना अल्ट्रासाउंड के ही लौटना पड़ता है। प्राइवेट अस्पतालों में महंगा रेट चुकाकर अल्ट्रासाउंड करवाना पड़ता है।

तेजी से बढ़ रही शुगर, किडनी व हार्ट की बीमारियां

प्रदेश में शुगर, किडनी और हार्ट के मरीजों का पता लगाने के लिए एनसीडी (नॉन कम्युनिकेबल डिजिज) सर्वे शुरू किया गया था। लेकिन कोविड के कारण ये बीच में ही बंद कर दिया। अब तक जिला में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जिससे ये पता चल पाए कि शुगर, किडनी व हार्ट के कितने रोगी हैं और कितनों को इलाज मिल पा रहा है।

एनसीसी सर्वे के नोडल अधिकारी रहे डाॅ. आरडी चावला का कहना है कि जागरुकता और सुविधाओं की कमी के कारण के लोगों को समय पर इन बीमारियों का पता नहीं चलता है और भविष्य में यही बीमारियां जानलेवा सिद्ध होती हैं। आमतौर पर 6 महीने बाद पूरे शरीर की जांच करवाई जानी चाहिए, लेकिन हमारे यहां गंभीर बीमार होने पर ही ये जांच करवाई जाती हैं और उसके बाद ही इन बीमारियों का पता चल पाता है।

सरकारी अस्पताल में उपचार न मिलने पर सैकड़ों किमी दूर जाना पड़ रहा

वे पिछले कई वर्षों से शुगर की बीमारी से पीड़ित हैं। कभी पटियाला तो कभी चंडीगढ़ से इलाज लेना पड़ता है। जिला अस्पताल में डाॅक्टर तक उपलब्ध नहीं है।
जगमाल राणा, गांव गोहरां।

उन्हें करीब एक वर्ष पहले हार्ट अटैक आया था और उसके बाद से उनका पटियाला प्राइवेट अस्पताल से उपचार चल रहा है। सरकारी में हार्ट के डाॅक्टर होते तो उन्हें 80 किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता।
सुभाष शर्मा, नेहरू गार्डन, कॉलोनी, कैथल।

उन्हें करीब एक वर्ष पहले हार्ट अटैक आया था और उसके बाद से उनका पटियाला प्राइवेट अस्पताल से उपचार चल रहा है। सरकारी में हार्ट के डाॅक्टर होते तो उन्हें 80 किलोमीटर दूर नहीं जाना पड़ता।
सुभाष शर्मा, नेहरू गार्डन, कॉलोनी, कैथल।

सिर में चोट लग जाए तो पीजीआई जाना ही एकमात्र रास्ता

सड़क हादसों में ज्यादातर मौतें सिर में चोट लगने की वजह से होती है। चोट लगने के तीन घंटें के अंदर घायल का उपचार शुरू हो जाना चाहिए। लेकिन पहले घायलों को पीएचसी, सीएचसी और जिला अस्पताल तक पहुंचने में ही कई घंटे लग जाते हैं और उसके बाद उन्हें न्यूरो सर्जन नहीं होने के कारण 125 किलोमीटर दूर पीजीआई चंडीगढ़ या रोहतक रेफर करना पड़ता है।

यहां तक पहुंचने में दो से तीन घंटे का समय लगता है और ज्यादातर मरीजों की मौत हो जाती है। हार्ट व किडनी के मरीजों का इलाज भी जिला में नहीं है और मरीजों को पीजीआई रोहतक व चंडीगढ़ ही जाना पड़ता है।

सीएचसी, पीएचसी महज डिलीवरी कराने तक सीमित

सामान्य ओपीडी के लिए भी मरीजों को सिविल अस्पताल कैथल आना पड़ता है। क्योंकि उनके आसपास स्थित प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में डिलीवरी को छोड़ अन्य सामान्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है और कुछ जगहों पर तो डिलीवरी की सुविधा भी नहीं है। खांसी, जुकाम होने पर भी मरीजों को 20 से 35 किलोमीटर दूर सिविल अस्पताल पहुंचना पड़ता है।

डॉक्टर्स व स्टाफ की कमी के बावजूद मरीजों को किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी जा रही है। कोरोना महामारी के बावजूद डॉक्टर्स व स्टाफ दिन रात मेहनत कर रहे हैं।
डाॅ. ओमप्रकाश, सिविल सर्जन, कैथल।

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