पढ़ाई की जगह गेम में उलझ रहा बचपन:अधिकतर समय बिता रहे बच्चे मोबाइल पर, आंखें हो रही कमजोर

कुरुक्षेत्र10 दिन पहलेलेखक: मुनीष मुंडे
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कोरोना महामारी के दौर में ऑनलाइन पढ़ाई ने बच्चों को मोबाइल फोन का गुलाम बना दिया। पढ़ाई से ज्यादा समय अब बच्चे गेम खेलने में व्यस्त रहते हैं। बच्चे ऑनलाइन गेम खेल अभिभावकों के पैसे भी उड़ा रहे हैं। अब बच्चों की आदत इतनी बिगड़ गई है कि कुछ देर के लिए उन्हें मोबाइल फोन न मिले तो उनमें चिड़चिड़ापन, बेचैनी, घबराहट व गुस्सा आता है। मोबाइल न मिलने के कारण बातचीत करना बंद कर देते हैं या खाना छोड़ देने जैसे लक्षण सामने आ रहे हैं।

स्मार्ट फोन के हाथ में आते ही उनका मूड ठीक हो रहा है। बच्चों के ऐसे व्यवहार के चलते परिजन बच्चों को अस्पताल की मानोरोग ओपीडी में पहुंच रहे हैं। मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से आंखों पर बुरा असर तो पड़ ही रहा है, मानसिक विकार भी आ रहे हैं। मनोरोग विशेषज्ञों के अनुसार जागरूक अभिभावक तो काउंसलिंग करवा रहे हैं लेकिन कुछ इन लक्षणों को अनदेखा कर रहे हैं। पिछले दो साल में बच्चे ज्यादा मनोरोगी हुए हैं।

शहर में मनोरोग ओपीडी में रोजाना 15 से 20 बच्चे अभिभावकों के साथ काउंसलिंग कराने पहुंच रहे हैं। शहर में तीन मनोरोग विशेषज्ञ की ओपीडी चल रही है। चिकित्सकों ने कहा कि लॉकडाउन में बच्चे मनोरोगी हो रहे हैं। आए दिन ग्राफ बढ़ता जा रहा है।

पर्सनल फोन लेने की जिद, छोड़ देता खाना : सेक्टर 30 वासी राजेश कुमार ने बताया की कोरोना काल के कारण हुई ऑनलाइन पढ़ाई से बच्चों का रुझान मोबाइल फोन की तरफ ज्यादा हुआ है। मोबाइल फोन को लेकर आए दिन बच्चे उनसे नाराज रहते हैं। महंगे पर्सनल फोन की डिमांड करता है। कई बार तो जिद इतनी बढ़ जाती है कि खाना तक छोड़ देता है। काफी समझाने के बाद कुछ समय ठीक रहता है फिर से जिद करने लगता है।

असर - 30 से 40 प्रतिशत बच्चों को लग चुके चश्मे
राणा ऑप्टिकल संचालक अंकित कुमार ने बताया कि पिछले दो साल में 30 से 40 प्रतिशत बच्चों को चश्मे लग चुके हैं। 20 से 25 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जिन्हें पहले चश्मे लगे हुए थे लेकिन अब उनके नंबर बढ़ गए हैं। बच्चों के ज्यादा मोबाइल फोन व लैपटॉप यूज करने के चलते अभिभावक एंटी रिफ्लेक्शन चश्मे बनवा रहे हैं। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र परुथी का कहना है कि मोबाइल का कम इस्तेमाल ठीक है, अन्यथा यह लत है। मूड ठीक करने के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल भी ऐसा ही है, जैसे ड्रग्स व्यवहार को प्रभावित करती है। मोबाइल का कम ही इस्तेमाल करें।

निगरानी - बच्चों पर अभिभावक रखें नजर
अभिभावक बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान उनके साथ रहें और नियमित मॉनिटरिंग करें। कोशिश करें कि कम मोबाइल का इस्तेमाल करें। यदि बच्चे का हावभाव बदले तो इसे हल्के में न लें। बच्चा कमरे में अकेला रहना पसंद करें तो तुरंत अभिभावक ध्यान दें। बच्चों के साथ मित्र बनकर विचार साझा करें। बच्चों को मोबाइल, लैपटॉप जरूर दें लेकिन एक निर्धारित सीमा तक।

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