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योगदान पर संगोष्ठी:नई शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा में पाठ्यक्रम पढ़ाने पर जोर : प्रो. सचदेवा

कुरुक्षेत्र8 दिन पहले
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  • केयू के सीनेट हॉल में भारत की आजादी में साहित्यकारों के योगदान पर संगोष्ठी

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में केयू के हिंदी विभाग, युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग और इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटिड एंड ऑनर्स स्टडीज की ओर से भारत की आजादी में साहित्यकारों का योगदान पर राष्ट्रीय संगोष्ठी की गई। इसमें मुख्यातिथि केयू कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है क्योंकि हिंदी जैसी बोली जाती है वैसे ही लिखी भी जाती है। संपर्क भाषा, संवाद या संख्या की दृष्टि से हिंदी सबसे ज्यादा प्रयोग होने वाली भाषा है।

इससे पहले कुलपति प्रो. सचदेवा, कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा, राष्ट्रपति सचिवालय के विशेष कार्य अधिकारी मुख्य वक्ता डॉ. राकेश बी दूबे, डॉ. सुधांशु शुक्ला, हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा, केयू के पूर्व हिंदी अध्यक्ष प्रो. लालचंद गुप्त मंगल और बीआर अंबेडकर अध्ययन केंद्र के सह-निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह ने मां सरस्वती की प्रतिमा पर दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। प्रो. सोमनाथ ने डॉ. सुधांशु शुक्ला द्वारा रचित तीन पुस्तकों का विमोचन भी किया। उन्होंने कहा कि कई राज्यों के अंदर, कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग होना शुरु हो चुका है। नई शिक्षा नीति 2020 के तहत मातृभाषा में पाठ्यक्रम पढ़ाए जाने पर जोर दिया है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के शैक्षणिक पाठ्यक्रम भी हिंदी व अंग्रेजी माध्यम में चलाए जा रहे हैं। लॉ व इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों को भी हिंदी भाषा में चलाए जाने का प्रयास है। केयू के विधि विभाग ने विद्यार्थियों को प्रश्न पत्र हिंदी व अंग्रेजी दोनों माध्यम में देने का फैसला किया है। वर्तमान में 45 से अधिक देशों में हिंदी में अध्ययन व अध्यापन कार्य चल रहा है।

समाज का दर्पण होता है साहित्य : मुख्य वक्ता डॉ. राकेश बी दूबे ने कहा कि साहित्य को समाज का दर्पण भी कहा जाता है। पत्रकारिता का कार्य जोखिम भरा कार्य है। पत्रकारिता ने स्वतंत्रता में परतंत्रता की बेड़ियां काटने का काम किया। पत्रकारों व साहित्यकारों ने हिम्मत नहीं हारी, उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को जगाने का कार्य किया। हरियाणा साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. चंद्र त्रिखा ने कहा कि हिंदी ने आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई व राष्ट्रीय चेतना जगाई। साहित्यकारों ने स्वतंत्रता की लौ जलाए रखी। समाचार पत्र अगर स्वाधीनता संग्राम के दिनों में छपता था और उसमें कुछ सत्ता के खिलाफ होता था तो अखबारों की प्रतियां जब्त कर ली जाती थी और संपादक को जेल भेजा जाता था। केयू के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. लालचंद गुप्त मंगल ने कहा कि हिंदी भाषा और स्वाधीनता आंदोलन दोनों पर्यायवाची हैं। दोनों का गहरा संबंध है। 10 मई 1857 को हरियाणा के अम्बाला व उधर मेरठ से जब स्वाधीनता आंदोलन की चिंगारी उठी तो उस समय भारतेंदु हरीशचंद्र केवल सात वर्ष के थे। वे 1850 को जन्मे थे और उनकी मृत्यु सन् 1885 में 35 वर्ष की अल्पायु में हो गई थी। इतनी अल्पायु में ही उन्होंने 98 दोहों के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन को गति देने का कार्य किया। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुभाष ने सभी का आभार जताया। इस अवसर पर युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. अनिल वशिष्ठ, प्रो. बिंदु शर्मा, कुटा प्रधान डॉ. परमेश कुमार, सचिव डॉ. विवेक गौड़, डॉ. संजीव गुप्ता, डॉ. जसविंद्र, डॉ. कामराज, प्रो. भीम सिंह, डॉ. गुरचरण सिंह, डॉ. नवनीत बहल, डॉ. रामचंद्र, डॉ. अशोक शर्मा, प्राचार्य डॉ. कामदेव झा मौजूद रहे।

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