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शिक्षा संवाद:हिंदी केवल एक भाषा नहीं बल्कि संस्कार, संस्कृति एवं आत्मगौरव का प्रतीक है : डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र

कुरुक्षेत्र4 दिन पहले
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कुरुक्षेत्र सर्वक्षेष्ठ गीत प्रस्तुति के लिए भूमिक को स्मृति चिन्ह देते डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र। - Dainik Bhaskar
कुरुक्षेत्र सर्वक्षेष्ठ गीत प्रस्तुति के लिए भूमिक को स्मृति चिन्ह देते डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र।

मातृभूमि शिक्षा मंदिर में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में शिक्षा संवाद का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। शुभारंभ वैदिक मंत्रों एवं स्वस्ति वाचन से हुआ। मिशन के संस्थापक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि अपनी भाषा ही मजबूती एवं सुदृढ़ प्रतिष्ठा का आधार मातृभाषा है। बच्चों के भविष्य की चिंता इसी प्रकाश में करनी चाहिए। यदि बच्चा अपने समाज की भाषा गंभीरतापूर्वक नहीं सीखता तो वह भले ही कितना ही बड़ा आदमी बन जाए, उसके आत्म वान मनुष्य बनने में संदेह है।

हिंदी भारत के लिए केवल एक भाषा नहीं बल्कि संस्कार, संस्कृति एवं आत्मगौरव का प्रतीक है। डॉ. मिश्र ने कहा कि साहित्य, संस्कृति और सद्भाव की भाषा हिंदी को, व्यापार-उद्योग, तथा प्रौद्योगिकी की भाषा बनाना चाहिए, जिससे हिंदी किसी अनुशंसा से नहीं, अपितु अपनी शक्ति से संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन सके। कोई भी राष्ट्र हो या मनुष्य उसकी आत्मनिर्भरता आर्थिक ही नहीं, भावनात्मक और मानसिक भी होती है।

यूरोपीय, अमेरिकी, जर्मनी, जापान, रूसी, कोरियाई आदि देशों के लोगों के विकास, आत्माभिमान और आत्मविश्वास का रहस्य स्व-भाषा के प्रति प्रेम, सम्मान एवं सर्वोच्च प्राथमिकता देना है। डॉ. मिश्र ने कहा कि हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोलते पढ़ते और लिखते हैं। महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। विज्ञान एवं तकनीक के सहारे पूरी दुनिया एक वैश्विक गांव में तब्दील हो रही है और स्थलीय व भौगोलिक दूरियां अपनी अर्थवत्ता खो रहीं हैं।

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