डॉ. शंकर ने कहा:कविता सामूहिकता में उत्साह पैदा करने का कार्य करती है

कुरुक्षेत्र5 दिन पहले
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साहित्य परिषद हिंदी विभाग केयू व देस हरियाणा पत्रिका के सहयोग से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और हिंदी कविता विषय पर ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया जिसमें आलोचक, समीक्षक और केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा के सहायक प्राध्यापक डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने बताया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई नहीं थी बल्कि सदियों से चलती आ रही सामंतवादी सोच से भी लड़ाई थी। कोई भी साहित्य और विचारधारा हर वर्ग की मुक्ति के बिना अगर स्वतंत्रता की कामना कर रहा है तो उसे संदेह की दृष्टि से देखने की जरूरत है।

डॉ. शंकर ने कहा कि साहित्य की व्याख्या बहुत सीमित दायरे में की जाती है लेकिन साहित्य को विस्तार देने की आवश्यकता होती है। कविता सामूहिकता में उत्साह पैदा करने का कार्य करती है और बिना सामूहिक उत्साह के कोई भी आंदोलन और परिवर्तन नहीं हो सकता। डॉ. सिद्धार्थ ने कहा कि साहित्य का पहला उत्तरदायित्व होता है कि प्रतिरोध की चेतना पैदा करे और इसके साथ वह सृजनात्मक भी होना चाहिए। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से बताया कि साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास होता है।

साहित्य जनता की चित्तवृत्तियों का संचित प्रतिबिंब होता है और इसी संचित प्रतिबिंब की झलक हमें आजादी के आंदोलन में दिखाई देती है। उन्होंने विभिन्न कवियों की कविता के उदाहरण देकर बताया कि कैसे भारतीय कवियों ने अपनी कविता के माध्यम से आजादी के आंदोलन में जनता में चेतना पैदा करने का काम किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता देस हरियाणा पत्रिका के संपादक डॉ. सुभाष चंद्र ने की।

उन्होंने कहा कि कविता वर्तमान दौर में मनुष्य को भटकाव और भ्रमित होने से बचाती है और जीवन में स्पष्ट राह दिखाती है। उन्होंने कहा कि दूसरों से घृणा करना और इतिहास के पक्षों को काले से सफेद करना और सफेद से काला करना सच्चे देश प्रेम का काम नहीं है बल्कि अपने देश की विरासत से शक्ति अर्जित करते हुए पाखंडों और दोषों की खुलकर आलोचना करना देश प्रेम है। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के प्राध्यापक विकास साल्याण ने किया।

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