डॉक्टरर्स-डे आज / एमबीबीएस डॉ. रमेश सिंघल 53 साल से दे रहे नि:शुल्क परामर्श, बीमार मां-बाप की सेवा के लिए पूरा किया सपना

डॉ. रमेश सिंघल मरीज का उपचार करते हुए। डॉ. रमेश सिंघल मरीज का उपचार करते हुए।
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डॉ. रमेश सिंघल मरीज का उपचार करते हुए।डॉ. रमेश सिंघल मरीज का उपचार करते हुए।

  • लाडवा के पहले एमबीबीएस डॉक्टर के संघर्ष की पढ़े कहानी

दैनिक भास्कर

Jul 01, 2020, 07:13 AM IST

लाडवा. इरादा अगर मजबूत व नेक हो तो दुनिया में कोई भी काम ऐसा नहीं है, जिसे न किया जा सके। घर में मां-बाप बीमार होने पर एक बच्चे ने सोचा कि मुझे भी डॉक्टर बनना है। इसके बाद रात-दिन एक करके पढ़ाई की और डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। लाडवा के अंदर 81 वर्षीय डॉ. रमेश सिंघल पिछले 53 सालों से मरीजों का नि:शुल्क उपचार कर रहे हैं। 

लाडवा के मेन बाजार स्थित अपने क्लीनिक पर जानकारी देते हुए लाडवा के सबसे पहले एमबीबीएस डॉक्टर रमेश सिंघल ने कहा कि जब वे छोटे थे तो उनके माता-पिता बहुत बीमार रहते थे। घर पर डॉक्टर उनके इलाज के लिए आया करते थे। तभी मन में ठान लिया था कि एक दिन खुद डॉक्टर बनकर अपने माता-पिता का तो इलाज करूगा ही, साथ ही शहर के लोगों की सेवा भी करूंगा। चार अगस्त 1939 को पैदा हुए डॉ. रमेश ने 1955 में लाडवा के हाई स्कूल से 10वीं पास की थी।

 अब यह स्कूल राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय बन चुका है। उसके बाद डॉक्टरी की पढ़ाई शुरू की और 1962 में लाडवा के पहले एमबीबीएस डॉक्टर बने। उन्होंने कहा कि 1962 से लेकर 1965 तक उन्होंने पंजाब के अंदर एक डॉक्टर के रूप में सरकारी नौकरी की। उसके बाद 1965 के अंदर पंजाब से अलग होकर हरियाणा राज्य की स्थापना हुई। हरियाणा के अंदर 1965 से लेकर 1967 तक सरकारी डॉक्टर के रूप में नौकरी की। 1967 से लेकर अभी तक वे अपने क्लीनिक पर लोगों का उपचार करते हैं।

उन्होंने कहा कि डॉक्टर बनने के बाद उन्होंने अपने माता-पिता का भी न केवल इलाज किया। इसके साथ-साथ जी तोड़ मेहनत कर अपने सपने को भी पूरा किया। उन्होंने बताया कि उनके दो बेटे और दो बेटियां है। बड़ा बेटा दिल्ली के अंदर डॉक्टर है। वहीं छोटा बेटा लाडवा में खेती कर रहा है। डॉ. रमेश ने बताया कि आमदन के लिए खेती योग्य भूमि है और साथ ही शहर में बनी दुकानों का किराया भी आता है।

2010 में 2 रुपए की पर्ची शुरू की थी, बाद में सारे पैसे किए दान
डाॅ. रमेश सिंघल ने अपने क्लीनिक पर 2010 में दो रुपए की पर्ची काटनी शुरू की थी। 2017 तक दो रुपए के हिसाब से मरीज देखते रहे। डाॅ. रमेश ने बताया कि 2017 में मन में आया कि दो रुपए भी लेने बंद किए जाएं। इसके बाद से अब तक नि:शुल्क मरीजों का इलाज किया जा रहा है।

इतना ही नहीं लोगों से दो रुपए पर्ची के हिसाब से जो पैसे लिए थे उन्हें भी दान कर दिया। उन्होंने बताया कि उनके क्लीनिक पर जितनी भी दवा सैंपल के रूप में आती है उनको भी वे जरूरतमंदों को नि:शुल्क देते हैं। उन्होंने कहा कि वे केवल मरीज को देखते हैं और दवा की पर्ची लिखकर दे देते हैं।

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