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विविधता में एकता:4 राज्यों में वामन भगवान के 6 ऐतिहासिक मेले, 3 हजार किमी. की दूरी, फिर भी एक जैसी परंपरा

अम्बाला9 दिन पहलेलेखक: रितिका एस. वोहरा
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  • देश के दक्षिण से उत्तर तक लगने वाले 6 ऐेतिहासिक वामन मेलाें पर भास्कर की खास रिपोर्ट
  • भास्कर खास : एक पग में दुनिया नापने वाले भगवान वामन के अम्बाला के अलावा केरल, पंजाब व हिप्र में लगते हैं बड़े मेले

आज से अम्बाला सिटी में वामन द्वादशी का तीन दिवसीय मेला शुरू हाेने जा रहा है। अम्बाला के अलावा ऐसा मेला जगाधरी (1989 से पहले अम्बाला का हिस्सा था), केरल, पंजाब के पटियाला व नाभा और हिमाचल के सिरमौर जिले के नाहन में भी भरता है। दिलचस्प है कि उत्तर भारत के तीन राज्यों में हिंडोले, नौकाविहार और व्रत की जैसी परंपराएं हैं, वैसी ही दक्षिण भारत के राज्य केरल में हैं। केरल दैत्य राज बलि का राज्य माना जाता है। जिन्होंने देवताओं को हराकर स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। इसके बाद देवताओं के मदद मांगने पर भगवान विष्णु ने देवमाता अदिति के गर्भ से वामन रूप में अवतार लिया।

एक दिन राजा बलि यज्ञ कर रहा था, तब वामनदेव बलि के पास गए और तीन पग धरती दान में मांगी थी। शुक्राचार्य के मना करने के बाद भी राजा बलि ने वामनदेव को तीन पग धरती दान में देने का वचन दिया। इसके बाद वामनदेव ने विशाल रूप किया। एक पग में धरती और दूसरे पग में स्वर्ग नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने वामन देव को खुद के सिर पर पैर रखने को कहा। वामनदेव ने जैसे ही बलि के सिर पर पैर रखा, वह पाताल लोक पहुंच गया। बलि की दानवीरता से खुश होकर भगवान ने उसे पाताल लोक का स्वामी बना दिया और सभी देवताओं को उनका स्वर्ग लौटा दिया।

आज के कार्यक्रम

सिटी की पुरानी अनाज मंडी के पंडाल में हिंडाैलाें काे स्थापित होंगे। दाेपहर 2 से शाम 5 बजे तक मास्टर जिम्मी, 5 से 8 बजे तक भजन गायक उमेश व रात 8 से 11 बजे तक मास्टर बाॅबी भजन गान करेंगे।

केरल: थ्रिक्काकरा में भगवान वामन का है मंदिर..... इसी दिन 10 दिवसीय ओणम पर्व की शुरुआत
केरल के शहर कोच्चि में थ्रिक्काकरा में भगवान वामन का मंदिर है। पंडित नारायणन ने बताया कि वामन जयंती पर यहां खास पूजा की जाती है। इसी के साथ 10 दिवसीय ओणम पर्व की शुरुआत होती है। यहां के लोगों का मानना है कि ओणम उत्सव के दौरान राजा बलि यहां आते हैं। केरल का भगवान वामन का थ्रिक्काकरा मंदिर कब बना, वहां की मूर्ति कितने साल पुरानी है, इस बारे में सटीक जानकारी तो मौजूद नहीं है लेकिन मंदिर से मिले शिलालेख 10वीं से 13वीं शताब्दी के हैं। हालांकि, मूल मंदिर और भी पुराना बताया जाता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि कि ये मंदिर चेर राजवंश के शासन काल का है। अभी माैजूदा वामन मूर्ति मंदिर की वर्तमान संरचना ज्यादा पुरानी नहीं है। सालों से ये मंदिर धीरे-धीरे टूट रहा था और 1900 के दशक तक यह बहुत हद तक टूट चुका था। इसलिए 20वीं सदी के शुरुआती सालों में मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया गया है।

नाहन: 300 साल से 9 पालकियां निकलती हैं..... नरसिंह भगवान की पालकी का नाैका विहार
हिमाचल प्रदेश के सिरमाैर जिले के नाहन में एक दिन का मेला लगता है। वामन द्वादशी वाले दिन 9 पालकियां निकलती हैं। नरसिंह भगवान की पालकी नाेहनी के मंदिर से, रघुनाथ भगवान की रघुनाथ मंदिर से, वामन भगवान की कच्चे टैंक के पास वामन भगवान मंदिर से, एमईएस मंदिर, महादेव का मंदिर रानीताल गार्डन से, सनातन धर्म मंदिर से, लक्ष्मी नारायण मंदिर जगन्नाथ मंदिर के प्रांगण में पहुंचती है। यहां से जगन्नाथ मंदिर की दाे पालकियों काे जाेड़कर 9 पालकियां जगन्नाथ मंदिर से हिंदू आश्रम, नया बाजार, माल राेड, गुन्नू घाट हाेते हुए पक्का टैंक महादेव मंदिर के पास पहुंचती हैं।

उसके बाद पालकियों काे पूजा-अर्चना के लिए रखा जाता है। रात काे नरसिंह भगवान की पालकी का नाैका विहार करवाया जाता है। बाकी पालकियां बाहर हाेती हैं। उसी रात 12 बजे सभी पालकियां वापस मंदिर में आ जाती हैं। लगभग 300 साल पहले रियासत के समय यह मेला लग रहा है। काफी समय पहले इस मेले काे सनातन धर्म मंदिर सभा करती थी, लेकिन अब जिला प्रशासन कराता है। रास्ते में लाेग अपनी दुकानाें व घराें में पालने के विश्राम के लिए जगह बनाते हैं। कहा जाता है कि जहां दाे मिनट भी पालना रखा जाता है वहां सुख-समृद्धि आती है।

अम्बाला: सबसे ज्यादा 3 दिन का मेला यहीं..... 1907 तक के सरकारी रिकॉर्ड में मेला दर्ज
वामन द्वादशी पर उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला अम्बाला में ही लगता है। यह मेला भादो में दशमी, एकादशी व द्वादशी को लगता है। अम्बाला सिटी के 5 मंदिरों से ठाकुर जी के हिंडोले (डोलों) की शोभायात्रा निकलती है। यह नौरंगराय तालाब से शुरू होकर पुरानी अनाज मंडी तक पहुंचती है। यहां दो दिन हिंडोले रुकते हैं। आखिरी दिन वापस शोभायात्रा के साथ पांचों हिंडोलों को नौरंगराय तालाब में विशेष नौका से तैराया जाता है। उसी रात डोलों को उनके मूल मंदिरों में विराजित करने के साथ मेला समाप्त हो जाता है।

मेले के आखिरी दिन जिस नौरंगराय तालाब में डोले तैराए जाते हैं, वो असल में नवरंग राय के नाम पर है। तालाब की जमीन हीरा लाल के पुत्र नवरंग राय ने दान में दी थी। राय की 9वीं पीढ़ी आज भी अम्बाला सिटी में रहती है। पुरानी सरकारी चिट्ठियाें व रिकाॅर्ड से मेले का 1907 तक का रिकॉर्ड मिलता है। 1907 में यात्री अब्दुल राशिद की लिखी किताब में जिक्र है कि अम्बाला में वामन द्वादशी का महत्वपूर्ण मेला है, जिसमें 20 से 25 हजार श्रद्धालु आते हैं। आजादी के पहले से सनातन धर्म सभा मेले का आयोजन कर रही है।

जगाधरी: 114 साल से लगाया जा रहा है मेला..... 12 मंदिरों से चौक बाजार में इकट्‌ठा होते हैं हिंडोले
जगाधरी में 114 सालाें से दो दिन का वामन मेला लगाया जा रहा है। 1943 से रजिस्टर्ड श्री सनातन धर्म सभा व स्कूल मैनेजिंग कमेटी मिलकर आयाेजन करते हैं। एकादशी वाले दिन इतिहास गद्दी जिसमें पुराने वेद हैं, काे पालकी में बिठाकर छाेटी लाइन से निकलती है। अगले दिन द्वादशी पर भगवान का पालने हिंडोले में चांदी के राम, सीता, लक्ष्मण की मूर्ति काे बिठाकर यात्रा निकलती है।

चाैक बाजार पर पहुंचकर 12 मंदिरों सत्यनारायण मंदिर, पावना मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, सनातन धर्म महावीर दल मंदिर, महंत कल्याणदास मंदिर, शिव मंदिर कमेटी देवी भवन बाजार जगाधरी, पंडित सुमेरचंद गली सेठियान, कर्मवेद पाठशाला, आसन वाली देवी, डेरा महंत सुरेंद्र दास, शिव मंदिर पुराना छछराैली राेड, लाला कर्मचंद मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर चाैक ब्राह्मणा, मंदिर राधा कृष्ण सेक्टर-17 हुडा के मंदिराें में वामन स्वरूप बनाकर हिंडाेले चाैक बाजार पर पहुंचते हैं। गाैरी शंकर मंदिर में बने कुंड पर भगवान का मेला लगता है। बड़े हिंडाेले काे कुंड में बेड़ा बनाकर तैराया जाता है। सतीश कुमार गर्ग ने बताया कि यह 114वां उत्सव है। काेविड के कारण गणेश की झांकी, भगवान का पालना व दाे बैंड के साथ यात्रा निकलेगी।

पटियाला: मिर्च मंडी में है वामन भगवान का मंदिर.....कभी पटियाला के महाराजा पालकी लेकर चलते थे
सनाैरी अड्डा, मिर्च मंडी में भगवान वामन का मंदिर है। महंत रविकांत मुनि कहते हैं कि मंदिर का इतिहास कितना पुराना है, यह कहना मुश्किल है लेकिन माना जाता है कि पटियाला के बसने से पहले यहां सरस्वती नदी बहा करती थी। तब से यहां मंदिर विद्यमान है। नगर बसने के बाद यहां मेले व पालकी की परंपरा शुरू हुई। शुरू में यहां वामन भगवान की प्राचीन प्रतिमा हुआ करती थी, लेकिन 1980 के आसपास चाेरी हाे गई। कुछ कारणवश मंदिर वीरान पड़ा रहा। 2007 में भगवान श्री वामन अवतार मंदिर जीर्णोद्धार समिति बनाई गई।

उसके बाद दाेबारा से इस मंदिर से हिंडोले में भगवान वामन के प्रतीकात्मक रूप की शोभायात्रा निकली शुरू हुई। यहां 4 साल पहले मध्यप्रदेश से अष्टधातु की 2 क्विंटल की मूर्ति बनाकर विराजमान की गई है। वामन द्वादशी वाले दिन हर साल मंदिर से भगवान काे पालकी में बिठाकर नगर भ्रमण के लिए निकालते हैं। शाम के समय खास टिपरी करवाई जाती है। पूरे शहर में शोभायात्रा करवाने के बाद मंदिर में तालाब पर परिक्रमा करवाई जाती है। पटियाला के महाराजा के समय में राजा पालकी लेकर चलते थे। वामन द्वादशी के दिन यहां हुंडी रखी जाती है। इस हुंडी में ऐसे श्रद्धालु दान डालते हैं, जिनकी काेई मनोकामना हाे या काेई काम फंसा हुआ है। इस दिन व्रत रखने की परंपरा है।

नाभा: 72 संस्थाओं से बनी उत्सव समिति कराती है मेला.....यहां टिपरी व आतिशबाजियां मुख्य आकर्षण
पंजाब के नाभा शहर में 1907 से वामन भगवान का मेला चला आ रहा है। नाभा उत्सव समिति के उपप्रधान राेमी गाेयल ने बताया कि द्वादशी वाले दिन ठाकुर सत्यनारायण मंदिर देवी चाैक के हिंडाेले में लड्डू गाेपाल की सवारी लेकर चलते हैं। हिंडाेला पटियाला गेट से शुरू हाेकर, सदर बाजार से हाेते हुए देवी चाैक पर पहुंचता है। यहां झांकी प्रतियाेगिता करवाई जाती है, जिसमें 40 झांकियां हिस्सा लेती हैं। भगवान काे मक्खन व मिश्री का प्रसाद चढ़ता है।

गाेयल बताते हैं कि जब मेला शुरू हुआ था ताे सर्किल राेड पर कमाला वाला तालाब हुआ करता था जिसमें भगवान के हिंडोले काे तैराते थे। उसके बाद हाईकोर्ट एरिया में तालाब में तैराने लगे। लेकिन समय के साथ तालाब खत्म हाे गए और अब टैंक बनाकर लड्डू गाेपाल काे तैराया जाता है। उन्हाेंने बताया कि इस मेले काे करवाने में 72 संस्थाओं काे मिलकर नाभा उत्सव समिति करवाती है। इस माैके पर टिपरी व आतिशबाजियां मुख्य आकर्षण हाेती है।

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