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  • Dr. Manocha, Who Performed 1 Lakh Free Operations Of The Eyes, Closed The Eyes Forever, Used To Recite The Verses Of Geeta To The Patients.

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स्मृति शेष:आंखों के 1 लाख फ्री ऑपरेशन करने वाले डॉ. मनोचा ने सदा के लिए बंद की आंखें, मरीजों को गीता के श्लोक सुनाते थे

अम्बालाएक महीने पहले
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डॉ. मनोचा (फाइल फोटो)
  • गीता नगरी स्थित वीरजी कुटिया का प्रबंधन देखने वाले श्री गीता सत्संग ट्रस्ट के अध्यक्ष थे

उन्हें गीता कंठस्थ थी। सालों से ब्रह्ममुहूर्त में उठने की आदत को निभाया। बिना नागा वीरजी की कुटिया में जाते रहे। धर्म के लिए अलावा कर्म में विश्वास रखा। आंखों के एक लाख ऑपरेशन फ्री किए। उनकी ओपीडी का नियम था, जिसके पास पैसा नहीं उसका मुफ्त उपचार होगा। सैकड़ों-हजारों लोगों की आंखों की रोशनी कायम करने वाले 72 साल के डॉ. महेश मनोचा ने मंगलवार को दुनिया से आंखें बंद कर दी। मोहाली के एक निजी अस्पताल में उनका 20-22 दिन से उपचार चल रहा था। उन्हें निमोनिया हो गया था। छह साल पहले बाईपास सर्जरी हुई थी। 12 अक्टूबर को उनका जन्मदिन था।

बताते हैं कि महेश मनोचा के पिता डॉ. रामधन जगाधरी गेट पर चिकित्सीय सेवाएं देते थे। पटियाला के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस व एमएस की डिग्री लेने से पहने महेश मनोचा ने सिटी के आर्य स्कूल से पढ़ाई की। 1986 में उन्होंने आर्य स्कूल के चौक पर ही पत्नी डॉ. गुरमीत मनोचा के साथ मिलकर अपना अस्पताल शुरू किया। उनकी बेटी डॉ. दिप्ती मनोचा भी आई सर्जन हैं।

उनके पारिवारिक सदस्य डाॅ. सुधीर मेहता बताते हैं कि वो ओपीडी में अकसर गरीबों का उपचार मुफ्त में करते थे। हमें भी यही प्रेरणा दिया करते थे कि गरीब व जरूरतमंद की सेवा करनी चाहिए। एक लाख से ज्यादा सर्जरी उन्होंने फ्री करवाई हैं। लाेगाें की मदद करने और उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए आधी रात को भी तैयार रहते थे। अकसर अपने मरीजों को गीता के श्लोक सुनाते रहते थे। अम्बाला सिटी के विधायक असीम गोयल ने कहा कि डॉ. मनोचा ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी एक संत जैसा आचरण किया।

गीता के सहारे सदमे से उबरे, फिर दूसरों का सहारा बने
डॉ. मनोचा के जीवन पर गीता का विशेष प्रभाव था। बेटे की मौत के बाद जीवन में जो झटका लगा, उसके बाद गीता के जरिये ही खुद को संभाला। अम्बाला सिटी की मशहूर वीरजी की कुटिया का प्रबंधन संभालने वाले श्री गीता सत्संग ट्रस्ट के अध्यक्ष थे। गीता व सुंदरकांड का पाठ कंठस्थ था। अस्पताल के बाद ज्यादातर समय वे वीरजी की कुटिया में बिताते थे। खुद नल से पानी भरकर लाेगाें काे पिलाते थे। डाॅ. सुधीर मेहता बताते हैं कि मुझे या किसी भी डॉक्टर को अगर अ‌ाधी रात काे भी परेशानी हाेती ताे उनसे शेयर करते, वे उसका समाधान किए बिना नहीं साेते थे। डाॅ. मनाेचा सेवाभारती के साथ जुड़े हुए थे। उन्होंने कई जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई की जिम्मा उठाया।

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