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पर्यावरण प्रेमी:रिटायर्ड प्रोफेसर ने घर में लगा रखे 80 किस्म के पौधे, इनमें कई दूसरे देशों से लाए

अम्बाला सिटी7 दिन पहलेलेखक: पवन पासी
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अम्बाला सिटी | मनाली हाउस में घर में लगाए गए पाैधे दिखाते वेद प्रकाश विज और घर में हर तरफ लगे पौधे। भास्कर - Dainik Bhaskar
अम्बाला सिटी | मनाली हाउस में घर में लगाए गए पाैधे दिखाते वेद प्रकाश विज और घर में हर तरफ लगे पौधे। भास्कर
  • बोले- प्राकृति ने जो दिया उसे ही लौटा रहा हूं
  • साल 2004 में एसए जैन कॉलेज से अंग्रेजी विभाग के एचओडी पद से रिटायर हुए थे प्रो. वेद प्रकाश विज

कोरोना के दौरान ऑक्सीजन सबसे बड़ा मुद्दा रहा है। कोरोना कॉल ने ऑक्सीजन के महत्व को याद दिलाने का काम किया है। हमारे शहर के मनाली हाउस में रहने वाले रिटायर्ड प्रोफेसर वेद प्रकाश विज प्रकृति के इस पाठ को कभी भूले ही नहीं हैं। साल 2004 में एसए जैन कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के मुखिया के तौर पर रिटायर्ड हुए प्रोफेसर विज ने अपने घर में देसी-विदेशी 80 किस्म के सैकड़ों पौधे लगाकर ऑक्सीजन जेनरेशन प्लांट में तब्दील कर दिया है।

साल 2004 में कॉलेज से रिटायर्ड होने के बाद से प्रोफेसर विज अपनी पत्नी सुरेंद्र विज के साथ पौधे उगाने व देखभाल में लगे रहते हैं। घर किसी नर्सरी से कम नहीं है और जो पौधे प्रो. विज के घर में हैं वे नर्सरी में भी नहीं हैं। प्राकृति प्रेमी विज अपनी पत्नी के साथ यूरोप के एक दर्जन देश घूम चुके हैं। इंग्लैंड की निफ्टन नर्सरी से फ्रिशिया नस्ल का बीज लेकर पौधा अपने घर में उगाया है। घर की दूसरे घरों से पहचान तो अलग है ही है बल्कि तापमान भी 2 से 4 डिग्री तक कम रहता है। प्रो. विज के मुताबिक उन्हें सैर के लिए पार्क जाने की जरूरत नहीं पड़ती।

स्विटजरलैंड में साइंटिस्ट से मिली सीख, रॉक गार्डन के जनक से भी प्रभावित हुए

प्रोफेसर विज बताते हैं कि उनके पिता पर्यावरण प्रेमी थे और प्रकृति के प्रति प्रेम शुरू से ही था। हालांकि, उन्हें इस बारे सीख अपने गुरु वीर संत कुमार व स्विटजरलैंड में उसके होस्ट से मिली। साल 1970 के आसपास की बात है जब उनके गुरु वीर संत कुमार के इंको चौक के नजदीक अमृत नगर के घर में नर्गिस के फूल खिले हुए थे। ये फूल दुलर्भ ही उगा करते थे। वे इन फूलों को अपनी पत्नी को स्नेह स्वरूप भेंट करते थे।

जब वे स्विटजरलैंड गए तो उसने देखा कि उनके साइंटिस्ट मेजबान ने कटे हुए पेड़ों के बीच लक्कड़ के स्कल्पचर बनाए हुए थे। ये काटे गए पेड़ों से ही बनाए थे। जो पेड़े काटे थे वे इस तरह थे कि दोबारा उग आए थे। उन लोगों के प्रकृति प्रेम ने उन पर काफी गहरा प्रभाव छोड़ा। इसके अलावा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की तो चंडीगढ़ की हरियाली ने अमिट छाप छोड़ी। रॉक गार्डन बनाने वाले नेक चंद ने सीख दी कि कैसे धरती का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाए।

अपनी पेंशन के पैसे पाैधाें पर खर्च करते हैं

उनकी पत्नी को प्रकृति से प्रेम की वजह यह है कि उनके पिता का मनाली हाउस में ही एक हजार स्कवेयर फीट में घर होता था। सास का नाम मोतिया था और मोतिया फूलों की ही अलग से क्यारी थी। एक बेटी की नोएडा तो दूसरी की मुंबई में शादी हो चुकी है। जिनके घर भी उनकी तरफ पेड़ पौधों से हरे भरे हैं।

प्रो. विज के मुताबिक उन्होंने कोई माली नहीं रखा हुआ है और अपने हाथ से ही पौधे उगाते हैं। वे पेड़ पौधों पर अपनी पेंशन से ही खर्च करते हैं और हर माह लगभग 20 हजार रुपए खर्च रहता है। घर में नागालैंड का अदरक, अपराजिता, नर्गिस, बोगन विला, मोतिया, गुलदावदी, तुलसी, अलोविरा आदि के साथ सदाबहार नस्ल के पौधे हमेशा रहते हैं।

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