जन संकल्प से हारेगा कोरोना:हम कोरोना पॉजिटिव थे, जानकार खाना पहुंचाने से परहेज करने लगे थे, 22 दिन संघर्ष किया

अम्बाला6 महीने पहले
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नरेंद्र पाहवा, बैंक असिस्सेंट, अम्बाला कैंट | कोरोना वॉरियर - Dainik Bhaskar
नरेंद्र पाहवा, बैंक असिस्सेंट, अम्बाला कैंट | कोरोना वॉरियर
  • समझ में आया- जहां भी हो सके एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए
  • गंभीर कोरोना संक्रमण होने के बावजूद अपनी इच्छाशक्ति से कोरोना को हराने वालों की जांबाज कहानियां आज पढ़े परिवार की कहानी- पति-पत्नी हो गए थे संक्रमित, बेटियां वीडियो कॉल कर देखतीं तो विल पावर स्ट्रॉन्ग हुई

मच्छी मोहल्ला के द पोस्टल एंड आरएमएस बैंक में काम करता हूं। कोरोना की पहली लहर जब पीक पर थी, हम तब भी ड्यूटी कर रहे थे। पता ही नहीं चला कि कब इस वायरस ने मुझे गिरफ्त में ले लिया। एक दिन रात का साेते हुए कंपकंपी सी छूटी। मैं दवाई लेकर साे गया। रात तो तबीयत ठीक रही, लेकिन सुबह फिर बुखार हो गया। अचानक परिवार के सदस्यों की चिंता करते हुए मैंने 3 सितम्बर को कोरोना टेस्ट करवाया तो रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई। मैंने खुद को अलग कमरे में आइसोलेट कर लिया। अनजाने खतरे को भांपते हुए दोनों बेटियों 16 साल की राधिका व 13 साल की राधिका को उनके ननिहाल भेज दिया।

मेरी चिंता तब बढ़ने लगी जब 2 दिन बाद ही पत्नी शशि पाहवा को बुखार हुआ। घर में हम दोनों ही थे। अलग-अलग कमरों में और बीमार। किसी को खाना बनाने को बोलते तो पता लगा कि लोग सोशली कटने लगे हैं। दोपहर को वाइफ की तबीयत ज्यादा खराब हो गई। उन्हें बुखार और उल्टियां होने लगीं। रिश्तेदारों की मदद नहीं ले सकते थे क्योंकि छोटा भाई और उसका परिवार, बहन, मेरी मम्मी भी कोरोना पॉजिटिव हो गए थे। मुझे खुद ही हिम्मत करनी थी। कमजोरी बहुत हो रही थी, लेकिन वाइफ को देखकर रुका नहीं गया।

गाड़ी में बैठकर उन्हें सिटी के हीलिंग टच हॉस्पिटल लेकर गया। डॉक्टरों ने बताया कि टीएलसी बढ़ गई है और किडनी में संक्रमण हो गया है। मुझे हौसला दिखाना था क्योंकि इस अवस्था में हम दोनों ही एक दूसरे का सहारा थे। वाइफ की हालत बिगड़ रही थी। मैं बगैर सोचे खुद गाड़ी ड्राइव करके उन्हें पंचकूला के अलकेमिस्ट में एडमिट करवाया। वहां पत्नी की उल्टियां तो बंद हो गई लेकिन बुखार नहीं टूट रहा था। बेटियां दिन में 10-10 बार फोन करती। वीडियो कॉल करके हमें देखती। इससे मेरी विल पावर स्ट्रॉन्ग होती गई। अलकेमिस्ट में जब शशि की हालत बिगड़ने लगी तो डॉक्टरों ने चेस्ट का सीटी स्कैन करवाया, जिसमें संक्रमण अाया। वो भी कोरोना पॉजिटिव हो चुकी थी।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब मैं क्या करूं। गाजियाबाद वैशाली में रहने वाले छोटे भाई विजय ने सांत्वना देते हुए बोला कि भाभी और आप यहां आ जाअाे। यहां अच्छे से इलाज हो जाएगा। लेकिन वाइफ को लेकर कैसे जाऊं। क्‍योंकि एम्बुलेंस जाने को तैयार नहीं थी। तब मेरे लिए हमारे बैंक के चीफ मैनेजर सुशील शर्मा देवदूत बने। गाड़ी और ड्राइवर की व्यवस्था की। वैशाली में चंद्रा लक्ष्मी हॉस्पिटल में शशि को एडमिट करवा दिया। मेरी भी तबीयत बिगड़ गई थी और सांस लेने में दिक्कत हो गई। मुझे भी एडमिट होना पड़ा। डॉक्टरों से कहकर हम एक ही वार्ड में शिफ्ट हुए और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे।

24 सितम्बर को हम दोनों की रिपोर्ट नेगेटिव अाई। उन 22 दिनों के संघर्ष में मेरी आस कई बार टूटी तो कई बार खुद को अकेले ही हौसला दिया। जब समाज के लोगों ने साथ छोड़ दिया और कुछ रिश्तेदारों ने मदद की। चाचा गुलशन पाहवा और उनके बेटे आदित्य ने मानिसक मजबूती दी और आर्थिक तौर पर भी मदद की। मेरा मानना है कि जो लोग सोचते हैं कि कोरोना-वोरोना कुछ नहीं है, वो गलती करते हैं। जब सांस उखड़ने लगती है, तब पता चलता है।

खैर, घर लौटने के बाद सबसे पहले पूरे घर को सैनेटाइज करवाया। 26 सितम्बर को दोनों बेटियों को गले लगाकर मिले तो अहसास हुआ कि जिंदगी अनमोल है। 15 दिन तक बेटियाें ने पूरा घर संभाला। क्‍योंकि कोरोना ने हमें फिजिकली कमजोर कर दिया था। दोनों का वजन भी 10 से 12 किलाे कम हो गया। अब हम ठीक हैं। लेकिन सिहरन बाकी है, डर भी। एक बात समझ में आ गई कि विजय हमेशा हौंसले और समझदारी से मिलती है। नाजुक दौर में घबराना नहीं चाहिए बल्कि साथ देना चाहिए। सभी से अनुरोध है कि सुरक्षित रहें। कोई मित्र विपत्ति में हो तो साथ दें, वो कभी आपका अहसान नहीं भूलेंगे।नरेंद्र पाहवा, बैंक असिस्सेंट, अम्बाला कैंट | कोरोना वॉरियर

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