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दामला गोशाला विवाद:एनजीओ गोशाला से बेदखल पंचायत को हैंडओवर, पहले दिन ही चारे को तरसे गोवंश

यमुनानगर13 दिन पहले
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यमुनानगर| दामला गोशाला को पंचायत के हैंडओवर कराने पहुंचे अधिकारी।
  • उधर, कानूनी लड़ाई लड़ने वाले विनोद गुप्ता ने कहा- पंचायत को गोशाला देना हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना, आगे लड़ाई चलती रहेगी

दामला गोशाला को अब पंचायत संभालेगी। सोमवार को तहसीलदार तरुण कुमार पुलिस बल के साथ पंचायत को गोशाला हैंडओवर कराने पहुंचे। 8 साल से गोशाला चला रही लाला वधावाराम गोशाला समिति को बेदखल कर दिया गया। किसी तरह का वहां पर विवाद नहीं हुआ। 28 साल से चल रहे इस जमीन का विवाद अब भी खत्म होता नहीं दिख रहा। क्योंकि जिस जमीन पर गोशाला चल रही है उसे खाली कराने की लड़ाई लड़ने वाले पंचायत को गोशाला देने के फैसले को हाईकोर्ट के आदेशों के खिलाफ बता रहे हैं और आगे फिर से हाईकोर्ट जाने की बात कह रहे हैं। वहीं बताया जा रहा है कि पंचायत को गोशाला सौंपने के कुछ देर बाद ही सरपंच नरेश सैनी की तबीयत बिगड़ गई। इससे पंचायत की तरफ से पहले दिन ही गोवंश को चारा नहीं डाला गया। इससे गोवंश चारे को तरस गया। लेकिन बेदखल होने के बाद भी समिति के पदाधिकारियों ने वहां पर लगाए कर्मियों से गोवंश को चारा डलवाया।

गोशाला समिति के प्रधान रहे सौरभ सिंगला ने बताया कि यह गो चराने की जमीन है। वे पहले भी इस गोशाला को पंचायत को देने का ऐलान कर चुके थे। लेकिन तब पंचायत ने मना कर दिया था। सोमवार को प्रशासन ने पंचायत को सौंपने की बात कही तो उन्होंने गोशाला को पंचायत को सौंप दिया। उधर, सदर यमुनानगर थाना प्रभारी धर्मपाल सिंह का कहना है कि शांतिपूर्वक पूरी प्रक्रिया चली। किसी तरह का विवाद नहीं हुआ।

पंचायत को गोशाला देना हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना, हम आगे लड़ाई लडेंगे | जमीन को खाली कराने की लड़ाई लड़ने वाले रिटायर्ड एमई विनोद गुप्ता ने बताया कि पंचायत को गोशाला हैंडओवर करना हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना है। हाईकोर्ट के क्लीयर कट ऑर्डर हैं कि इस जमीन से गोशाला हटाई जाए। लेकिन गोशाला समिति के पदाधिकारियों ने सरपंच व अधिकारियों से मिलकर इस जमीन को खाली कराने की बजाए पंचायत को दे दी। इसको लेकर अब वे आगे भी हाईकोर्ट जाएंगे।

यहां पर 225 गोवंश, दूध देने वाले 7 ही, कमाई 10 हजार, खर्च एक लाख प्रति माह| गोशाला को चलाना पंचायत के लिए आसान नहीं होगा। क्योंकि यहां पर आमदनी न के बराबर है। यहां पर 225 गोवंश हैं। इसमें 7 गाय ही दूध देती हैं। इससे हर माह 10 से 12 हजार का दूध बिकता है। वहीं यहां पर रखे गए गोवंश को घास डालने और देखरेख के लिए 7 लेबर कर्मी और एक चौकीदार रखा है। हर कर्मी की 10 हजार रुपए प्रति माह सैलरी है। इसके साथ ही पशुओं के लिए हरा से लेकर सूखा चारा तक खरीदना पड़ता है। जोकि हजारों रुपए का हर दिन आता है। इस तरह से एक लाख रुपए से ज्यादा का प्रति माह का खर्च है। जिसे पंचायत द्वारा दे पाना आसान नहीं होगा।

1992 से चल रहा जमीन पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट तक पहंुचा था मामला, सरपंच तक सस्पेंड हुआ

गांव दामला निवासी रिटायर्ड एमई विनोद गुप्ता ने बताया था कि गांव में 45 कनाल एक मरला जमीन सड़क के पास पंचायत की पड़ी है। उस पर आनंद प्रकाश ने 1992 में कब्जा कर लिया था। आरोप है कि तब उसमें से कुछ जमीन बेची भी गई। उस समय कोर्ट ने इस पर स्टे दे दिया था। वे हाईकोर्ट में पार्टी बनने के लिए गए लेकिन कोर्ट ने शिकायत डीसी को देने को कहा। उन्होंने शिकायत डीसी को दी। 1995 में केस डीडीपीओ की कोर्ट डाला गया। 1997 में फैसला हुआ कि जमीन पंचायत की है। आनंद प्रकाश तब कलेक्टर के पास शिकायत लेकर चला गया। उसकी शिकायत वहां 1999 में शिकायत खारिज हो गई।

प्रकाश ने अम्बाला मंडल कमिश्नर के वहां अपील की और फैसला प्रकाश के हक में आया। शिकायतकर्ता ने बताया कि इसे लेकर वे 2000 में हाईकोर्ट चले गए और वहां से स्टे मिल गया। तब तक प्रकाश ने वहां कुछ दुकानें काट दी थी और खोखे रख दिए थे। उस जमीन पर खेती भी की गई। वे पंचायत की जमीन वापस लेने के लिए लड़ाई लड़ते रहे। गुप्ता ने बताया था कि 2013 में हाईकोर्ट ने पंचायत की जमीन करार देते हुए अवैध कब्जा करार दे दिया। हाईकोर्ट के फैसले को लेकर प्रकाश सुप्रीम कोर्ट चला गया। वहां उसकी शिकायत डिसमिस हो गई। तब यह जमीन पंचायत को दे दी।

आरोप है कि प्रकाश ने साल 2013 में सरपंच नरेश से मिलकर वहां पर गोशाला के लिए सोसाइटी रजिस्टर्ड करा ली और वहां गोशाला खोल दी। नरेश ने गोशाला को जमीन देने के लिए रेजुलेशन पास कर दिया। स्पीकर बनने के बाद कंवरपाल वहां आए और उन्होंने लाखों रुपए गोशाला को देने की घोषणा की। वे फिर से अधिकारियों के पास गए। कोर्ट के ऑर्डर दिखाए तो 18 दिसंबर 2015 डीडीपीओ ने जमीन से गोशाला हटाने के लिए लिखा। आनंद प्रकाश ने अपील डाल दी लेकिन वह डिसमिस हो गई। तब उन्होंने सरपंच के खिलाफ डीसी को शिकायत दी कि रेजुलेशन रद्द किया जाए। गोशाला कमेटी कोर्ट चली गई और वहां से स्टेटस-को ले आई।

डीडीपीओ के पत्र पर जब पुलिस जमीन खाली कराने गई तो उन्हें स्टेटस-को का आदेश दिखा दिया। टीम वापस आ गई। उन्होंने शिकायत फाइनेंस कमिश्नर को भेजी। जुलाई 2018 में फाइनेंस कमिश्नर ने उनकी शिकायत डीसी को भेजी और जांच कर ऑर्डर देने की डायरेक्शन दी। डीसी ने सुनवाई कर अब सरपंच को सस्पेंड करने के आदेश दिए। तब सरपंच पर आरोप था कि उसने गांव की पंचायती जमीन को गोशाला को देने का रेजुलेशन पास किया। हालांकि बाद में हाईकोर्ट से स्टे के बाद सरपंच को बहाल कर दिया था। 18 कनाल 18 मरले जमीन गोशाला को देने के लिए रेजुलेशन पंचायत ने 2013 में पास कर दिया। रेजुलेशन के अनुसार यह जमीन 33 साल के लिए गोशाला कमेटी को दी गई थी लेकिन इस रेजुलेशन को अवैध करार दिया गया है।

राजनीतिक रंग ले गई थी गोशाला

इस गोशाला को गोशाला समिति को हटाने की मांग लंबे समय से उठ रही थी। मामला कोर्ट तक गया था। लॉकडाउन से पहले कुछ अधिकारियों ने जमीन खाली कराने का प्रयास किया। लेकिन इसका विरोध हुआ कि गोवंश को कहां पर लेकर जाएं। इसी बीच यह मामला राजनीतिक बन गया। पूर्व विधायक और विपक्षी नेता यहां पर आने लगे और अपनी राजनीतिक चमकाने लगे। इससे माहौल समिति के खिलाफ गया और अब उन्हें बाहर कर दिया गया।

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