पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

घर-घर इंडस्ट्री:उद्योग जगत में भले ही थी बैचेनी, मगर देश में जपी मंगाली के मनकों की माला

हिसार9 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

पांच गांवाें के दस्ते मंगाली के हर घर में मिनी इंडस्ट्री है। करीब 100 साल पहले एक घर में जपमाला प्राेडक्शन शुरू हुआ था। अब यह कारोबार इतना विस्तार ले चुका है कि यहां के मनके विदेशाें तक पहुंचते हैं। इससे जुड़े 70 से ज्यादा ग्रामीणाें ने अपनी-अपनी फर्म बना जीएसटी नंबर लिए हुए हैं। घर-घर छाेटा उद्याेग बसता है। एक कमरे में छाेटी आरा मशीन लगती है ऐर दूसरे में मनके काटने की मशीन। इस काराेबार से गांव के 1000 से ज्यादा लाेग जुड़े हैं। सालाना करीब 12 कराेड़ का काराेबार हाेता है। खास बात यह कि लाॅकडाउन में उद्योग बंद हाे गए ताे यहां उस दाैरान भी घर-घर काम चलता रहा।

तीन पीढ़ी से मनके बना रहे: विजय

विजय सिंह सुथार ने बताया कि उनका तीन पीढ़ियाें पुराना काम हैं। उनके पिता चंद्रभान सुथार ने सीएम चाै. भजनलाल के कार्यकाल में स्पेशल मनके काटने की मशीन की प्रदर्शनी के लिए चंडीगढ़ बुलाया था। मनके काटने की ये मशीन विशेष टेक्नीक की मशीन है। जिसमें 6, 8 व 10 एमएम के मनके बनाए जाते हैं। एक इलेक्ट्रिक माेटर पर तीन मशीनें चलती हैं। पुराने जमाने में पूर्वज हाथाें से मनके तैयार करते थे।

भारत के कई शहरों में डिमांड, थोक डीलर्स के एडवांस ऑर्डर आते हैं

ग्रामीण बताते हैं कि दिल्ली, वाराणसी, मथुरा वृंदावन, हरिद्वार और राजस्थान में भी मनके का बड़ा बाजार है। देश में जहां भी धार्मिक मेले लगते हैं वहां मंगाली के मनकाें की मालाएं पहुंचती हैं। यहां से बड़े डीलर थाेक में मनकाें की मालाएं लेकर जाते हैं और एडवांस में ऑर्डर देते हैं। सफेद चंदन और लाल चंदन की जपमाला चाइना, वियतनाम, सिंगापुर मलेशिया व जापान तक जाती हैं।

चाइना से आए लाेग सीखकर जा चुके हैं तकनीक, पहले लगती थी ओपन बाेली

लाॅकडाउन से कुछ समय पहले तक यहां चाइना के व्यापारी आते थे। मनकाें की ओपन बाेली लगती है। काैड़ी के हिसाब से मालाएं खरीदी जाती है। एक काैड़ी में 20 मालाएं। बेरी कीकर या सस्ती लकड़ियाें के मनकाें की मालाएं यहां 50 रुपये काैड़ी के हिसाब से थाेक में दी जाती हैं। सफेद चंदन से बनी 108 मनकाें की मालाएं हजाराें रुपये तक बिकती है।

खबरें और भी हैं...