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श्रीमद्भागवत कथा:गज को अपने बल पर अभिमान था, वह भूल गया था कि सबसे बड़ी सत्ता परमात्मा नाम की है

करनाल2 महीने पहले
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पुरुषोत्तम मास के पावन अवसर पर सद्भावना संस्कृत मंदिर निर्मल विहार में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ दिवस में सद्भावना दूत भागवताचार्य डॉ. रमनीक कृष्ण महाराज ने गजेंद्र मोक्ष की कथा का वर्णन करते हुए बताया के गज को अपने बल पर बहुत अभिमान था, वह भूल गया था कि इस जगत में सबसे बड़ी सत्ता परमात्मा नाम की है।

भगवान ने गज के पाव को जकड़ लिया बहुत प्रयत्न करने पर भी जब गज अपना पाव ना मुक्त कर पाया अंत में गजेंद्र ने भगवान के समक्ष करुण पुकार की। भगवान गज की करुण पुकार सुनकर द्रविभूत हुए गज को अपनी ओर खींच लिया। गज जड़ बुद्धि था कुछ स्तुति करना नहीं जानता था भगवान की। भगवान ने ही उसे स्तुति करने के लिए वाणी दी। मानव की स्थिति भी ऐसी ही है। अपने बल पे जीव को बड़ा अहंकार है, स्वयं को श्रेष्ठ मानना ही मानव की सबसे बड़ी भूल है परन्तु वो परमात्मा एक पल में मानव का अभिमान तोड़ देते हैं।

जीवन में संतोष सबसे बड़ा सुख है : मुनि पीयूष

उपप्रवर्तक पीयूष मुनि महाराज ने श्री आत्म मनोहर जैन आराधना मंदिर से अपने दैनिक संदेश में कहा कि लोभ प्रत्येक व्यक्ति के मन में किसी न किसी रूप में अवश्य रहता है। केवल दुनिया की चीजों का मोह ही लोभ नहीं है, मान-बढ़ाई की कामना भी लोभ है। लोभ इच्छापूर्ति से संतुष्ट नहीं होता, अपितु अमरबेल की तरह निरंतर बढ़ता ही जाता है। लोभी व्यक्ति को यदि सोने और चांदी के कैलाश पर्वत के समान ऊंचे पहाड़ भी दे दिए जाएं तो भी उसे संतोष नहीं होता। लोभ मन को बांध लेता है। लोभी व्यक्ति न्याय-अन्याय का तनिक भी विचार नहीं करता। लोभी व्यक्ति अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए दूसरों को दुःख देने में तनिक भी संकोच नहीं करता। दया का दैवी गुण उसके जीवन से दूर चला जाता है। लोभ अन्य पापों को जन्म देता है।

मुनि ने कहा कि लोभ पर विजय पाने के लिए आध्यात्मिक चिंतन की आवश्यकता है। यदि व्यक्ति यह चिंतन करे कि मृत्यु के बाद सभी दुनियावी पदार्थ तो यहीं धरती पर रह जाएंगे तथा उनकी प्राप्ति के लिए वह जो पाप करता है, वही पाप उसके साथ परलोक में चला जाएगा तो फिर वह कभी लोभ नहीं कर सकता। लोभी व्यक्ति दूसरों का सब कुछ हड़पना चाहता है। दूसरों की भावनाओं का वह कोई महत्त्व नहीं समझता। लोभी समाज से बहुत कुछ लेता है तथा बदले में समाज को कुछ भी देना नहीं चाहता। लोभ छोड़ कर संताेष को अपनाएं और अपने जीवन में सुख पाने की भूमिका तैयार करें।

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