आनंद, टॉयलेट-एक प्रेमकथा जैसी फिल्मों से समझाई डॉक्टरी:KCGMC में MBBS स्टूडेंट्स की रुचि बढ़ाने, नए तरीके सीखने के लिए कार्यक्रम

करनालएक महीने पहले
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हरियाणा के जिले करनाल में कल्पना चावला राजकीय मेडिकल कॉलेज में MBBS कोर्स के 2022 बैच के विद्यार्थियों को फिल्मों के माध्यम से चिकित्सा जगत से जुड़े पहलुओं से रूबरू करवाया। यह गतिविधि प्रथम वर्ष के विद्यार्थिओं के लिए फाउंडेशन कोर्स के दौरान कम्यूनिटी मेडिसिन विभाग ने आयोजित की।

संस्थान निदेशक डॉ. जगदीश दुरेजा ने कहा कि फिल्मों को समाज का आइना कहा जाता है। बहुत बार ऐसा होता है कि 10-20 साल पहले देखी कोई पुरानी फिल्म, उसके दृश्य या उसके कोई गाने हमेशा-हमेशा के लिए हमारे दिल में बस जाते है और भुलाए नहीं भूलते। जब भी असल जिंदगी में उससे कोई मिलती-जुलती घटना घटती है तो वो दृश्य एकदम से आंखों के सामने आ जाता है। यह हमें उस घटना को समझने और सुलझाने में मदद करता है। इसी बुनियाद पर सिने मेडिसिन का सिद्धांत आधारित है। इसमें चिकित्सा जगत के कुछ पहलू फिल्मों के माध्यम से आसानी से विद्यार्थियों को सिखाए जा सकते हैं।

मेडिकल विषयाें से जुड़ी हैं फिल्में

कम्यूनिटी मेडिसिन के विभागाध्यक्ष डॉ. राजेश गर्ग ने इस गतिविधि को क्रियान्वित किया। इसका संचालन करते हुए सिने मेडिसिन पर एक लेक्चर लिया। उन्होंने बताया कि मेडिकल शिक्षा जगत में सिने- मेडिसिन नामक नई संकल्पना में उन फिल्मों का चयन किया जाता है, जिनकी कहानी स्वास्थ्य और मेडिकल से संबंधित विषय के इर्द-गिर्द घूमती है।

इसी दृष्टिकोण को आगे रखते हुए मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के संग्रहालय में सिने-मेडिसिन के पोस्टर लगाए गए हैं। इन फिल्मों के बारे में एक कैटलॉग भी बनाया गया है। इसमें इन फिल्मों से संबंधित स्वास्थ्य विषय पर जानकारी है। इनका डॉक्टरों को अपने कार्य और जीवन में गाहे-बगाहे सामना करना पड़ता है।

इन फिल्मों का किया चयन

कोर्स के दौरान विद्यार्थियों को मेडिकल रिसर्च पर कुछ फिल्मों का चयन किया गया है। इनमें एक डॉक्टर की मौत, जनस्वास्थ्य विषय पर बंगाली फिल्म गणशत्रु, मरीज के साथ संवाद और मानवीय भावनाओं पर आधारित मराठी फिल्म श्वास शामिल है। भ्रूण हत्या के नतीजों पर आधारित मातृभूमि, कैंसर मरीज पर बनी सदाबहार फिल्म आनंद शामिल है।

एड्स के सामाजिक कलंक पर बनी अंग्रेजी फिल्म फिलेडेल्फिया, फिर मिलेंगे और माय ब्रदर निखिल, माहवारी पर बनी फिल्म पैडमैन और शौचालय की महत्ता पर बनी टॉयलेट-एक प्रेम कथा आदि और अनेक फिल्मों के बारे में बताया गया। इन सब फिल्मों से विद्यार्थियों को इनके सामाजिक, भावनात्मक और इंसानी पहलुओं को समझने में आसानी होती है और ये उनके असल जीवन में अस्पतालों में लोगों से बेहतर संवाद बनाने में सहायता करती हैं।

8 साल के बच्चे की कैंसर ग्रसित आंखों का ऑपरेशन

विद्यार्थियों से अलग-अलग फिल्मों के कुछ चुनिंदा छोटे-छोटे दृश्य पर भी चर्चा की गई। खासकर श्वास फिल्म के कुछ मार्मिक दृश्यों की। इसमें दिखाया गया है कि किस तरह एक 7-8 साल के बच्चे की कैंसर से ग्रसित दोनों आंखों का ऑपरेशन कर उन्हें निकालना होता है। इसी दौरान बच्चा, उसके दादा, डॉक्टर और मेडिकल सोशल वर्कर के बीच किस तरह के मानवीय और भावनात्मक समीकरण बनते हैं, जो मेडिकल जगत को समझने के लिए हमें एक नए आयाम की तरफ ले जाते हैं।