पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • Local
  • Haryana
  • Corona Snatched The Parents, Now The Responsibility Of The Children Came On The Grandparents, Tai And Aunt

भास्कर Original:कोरोना ने मां-बाप छीने, अब दादा-दादी, ताई और बुआ पर आई बच्चों की जिम्मेदारी

हरियाणा4 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
मासूम बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदरी उम्र के 80 बरस पार कर चुके दादा-दादी, ताई और बुआ पर आन पड़ी है। - Dainik Bhaskar
मासूम बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदरी उम्र के 80 बरस पार कर चुके दादा-दादी, ताई और बुआ पर आन पड़ी है।
  • कोराेना ने प्रदेश में 95 परिवारों के बच्चों से माता-पिता छीने, पढ़िए ऐसे 4 परिवारों की दर्दभरी कहानियां
  • मजबूरी ऐसी: 67 की उम्र में दादा लगा रहे रेहड़ी, 80 बरस पार कर चुकी दादी मांग रही लंबी जिंदगी

प्रदेशभर में कोरोना से 10 हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। 95 परिवार ऐसे हैं, जिन बच्चों के सिर से मां और बाप दोनों का साया उठ गया है। उन्हें रोजी-रोटी के भी लाले पड़े हुए हैं। वहीं, मासूम बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदरी उम्र के 80 बरस पार कर चुके दादा-दादी, ताई और बुआ पर आन पड़ी है। इन परिवारों की दर्दनाक दास्तां जो भी सुनता है, आंखों से आंसू बहने लगते हैं।

फतेहाबाद का परिवार बिखरा- दादा पर आई जिम्मेदारी- उधार मांगकर कराया बेटे-बहू का इलाज, नहीं बचा पाया जान

फतेहाबाद, कोरोना ने मेरे बेटे और बहू को महज 8 दिन के अंतर में छीन लिया। बेटे राजकुमार (38) व बहू नीतू रानी (3) की दिसंबर 2020 में कोरोना संक्रमण के चलते मौत हो गई। 22 दिसंबर को बहू नीतू रानी की कोरोना से तबीयत बिगड़ी, पहले सरकारी अस्पताल ले गए, वहां से अग्रोहा रेफर कर दिया गया। 2 दिन बाद ही उसने दम तोड़ दिया। बच्चे अपनी मां की मौत का दुख जता रहे थे, वहीं संक्रमित हो चुके राजकुमार के इलाज में लगे थे। सरकारी, प्राइवेट अस्पतालों में घूमते हुए 18 दिन तक उपचार कराया, इलाज पर 5-6 लाख रुपए खर्च हुए, लेकिन राजकुमार नहीं बच पाया। 30 दिसंबर को उसने भी दम तोड़ दिया।

दोनो के 3 बच्चे हैं, जिनमें दो बेटे व एक बेटी शामिल हैं। अब बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी मुझे पर आ गई है। मेरी उम्र भी 67 है। घर में कमाने वाला कोई नहीं है। मेरी उम्र हो चुकी है, रेहड़ी लगाना मुश्किल होता है, लेकिन मजबूरी है, पेट तो पालना ही है। पोते-पोतियां छोटे हैं। सबसे बड़ा पोता करीब 18 साल का है। तीनों पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन अब बड़ा पोता काम देख रहा है। जिंदगी संकट भरी हो गई है।

सारा पैसा उधार मांग कर इकट्‌ठा किया था। अब परेशान हैं कि उधारी कैसे चुकाएं। यहां रोटी के भी लाले पड़े हुए हैं। मेरा बड़ा पोता 18 साल का है। मैं सुबह 5 बजे पहले मंडी में सब्जी लेने जाता हूं। फिर 9 बजे रेहड़ी लेकर फेरी लगाता हूं। शाम तक मुश्किल से रोटी-पानी का खर्च निकल पाता है। एक पोती व व छोटा पोता है। किराए के मकान में रह रहे हैं। वह मूलरूप से एमपी के हैं, लेकिन बरसों से फतेहाबाद में रह रहे हैं। आधार कार्ड, वोटर कार्ड सब यहां का है। -जैसा शक्ति नगर निवासी बुजुर्ग रामस्वरूप ने बताया।

जींद में जिंदगी की जद्दोजहद: 3 बच्चों का अब ताई ही सहारा- कैंसर से पिता का साया उठा था और कोरोना ने मां को भी छीना

जींद, भगवान ने भी कुछ नहीं सोचा, बेरहम कोरोना बच्चों के मां-बाप दोनों को निगल गया। मां को कोरोना ने और पिता को कैंसर ने। हमारा फर्ज है कि जितना बन पड़ेगा, उतना करेंगे। लेकिन सरकार को भी कुछ सहायता करनी चाहिए। किसी ने बताया कि 18 साल से नीचे दोनों बच्चों की 2500 रुपए पेंशन बन जाएगी, लेकिन बेटी की उम्र 17 साल से एक दो माह ऊपर हो गई है तो ऐसे में कुछ ही महीनें पेंशन मिलेगी। तो कैसे गुजारा चलेगा। बड़े बेटे साहिल की उम्र 18 से ऊपर है तो कहते हैं उसे कुछ नहीं मिलेगा। सरकार इस लड़के को सरकारी नौकरी लगवा दे तो गुजारा हो जाए।

दंपती का बड़ा बेटा आईटी फीटर ट्रेड में दाखिला लिए हुए है। उसकी मां का सपना था कि साहिल फौजी बने या फिर पुलिस में सिपाही। सुबह उठाते वक्त कहती थी- बेटा जल्दी उठ जा और दौड़ लगाया, मैं तेरे खातर दूध गर्म करती हूं। इसलिए अब आईटीआई के साथ पुलिस फौज की तैयारी कर रहा है। सुबह-शाम दौड़ लगाता है, ताकि उसकी मां सपना पूरा हो सके। बच्चों के पिता की बीमारी (कैंसर) में इतना पैसा लगा था कि घर बेचना पड़ा। अब खुद का मकान तक नहीं है।

बड़े बेटे से छोटी बेटी है, जो कभी अपनी मां से दूर नहीं रहती थी। इसकी मां कहती थी कि बेटी तू पढ़-लिखकर डाॅक्टर बनिए। सबसे छोटा एक बेटा है। उसे मां की बहुत याद आती है। मेरी बहू उसे बार-बार कहती थी बेटा तेरे जन्मदिन पर बढ़ियां ड्रेस लाऊंगी, मन लगा कर पढ्या कर। यूं सुनकर छोटा बेटा रो पड़ता है। बोला- अंकल बस और मत पूछो, बस रहने दो...। अब ताई ही हमारा सहारा है। -जैसा बच्चों की ताई कमलेश ने बताया।

पहले जवान बेटे, फिर पति को खोया, कोरोना से बहू की भी मौत, दादी ही 2 बच्चों का सहारा

चरखी दादरी, भगवान नै म्हारै साथ के थोड़ी ज्यादती करी सै, पहले मेरा जवान बेटा और बाद में घरआला ठा लिया था। दोनों सासू-बहू मिलकै पौता-पौती नै पाला थे कि इब कोरोना म्हारी बहू न भी लेग्या। बहु खेता मैं और मैं घर का काम कर कै बालकां नै पढ़ाण- लिखाण लागै रे थे। पर इब तो इन बालकां का कोई भविष्य ए कौनी बच्या। मेरी 80 साल की उम्र है, मेरा बच्चा कै साथ बैठकर खेलण का टेम था। पर इस उम्र मैं आकै दोबारा 20 साल आली उम्र की ढाल काम करण पड़ रया सै।

एक बुढ़ापा पेंशन मैं के काम चालै सै, बालकां न पालण खातर दूसरा आग्गै हाथ फैला कै कर्जा भी लेना पड़ रया सै। हालात इतने ज्यादा खराब होगे सै कि मेरा 13 साल का पोता मजबूरी मैं उसके मामा कै भेजना पड़ा सै। मेरे जवान बेटे राकेश कुमार 7 साल पहले और उसके बाद पति रघबीर सिंह की डेढ़ साल पहले ही मौत हो चुकी थी। अब बहू 40 वर्षीय राजेश देवी की 15 मई को कोरोना संक्रमण के कारण मौत हो गई। मेरी बहू ने पूरा परिवार को संभाल रखा था। वह खुद खेत में काम करके परिवार को पाल रही थी। मैं इस उम्र में भी अपने लिए और जिंदगी मांग रही हूं। -जैसा गांव मंदौला निवासी दादी सरबती देवी ने बताया।

पिता की मौत से मां हुई मेंटल डिस्टर्ब, घर छोड़ा

रोहतक, डीएलएफ कॉलोनी का ये दंपती कोरोनाकाल से पहले एक खुशहाल जिंदगी जी रहा था। परिवार का अच्छा रसूख था। परिवार के पास भी कोई कमी नहीं थी। दंपती की 17 साल की बेटी ऑस्ट्रेलिया में ही किसी स्कूल में पढ़ाई कर रही है। 13 साल की छोटी बेटी उनके साथ रह रही थी। कोरोना की दूसरी लहर में परिवार बिखर गया। दंपती में बैंक मैनेजर पति की मई में मौत हो गई। इससे पत्नी भी बदहवास हो गई।

उन्हें पहले से डिप्रेशन की दिक्कत थी। पति की मौत के बाद हालत ज्यादा बिगड़ गई। वह 13 साल की बेटी के साथ मारपीट कर कहीं चली गई है। गम के माहौल में रिश्तेदारों ने बच्ची को संभाला। उससे फोन पर संपर्क करते हैं तो मानसिक हालत सही न होने के कारण कभी कहीं तो कभी कहीं का पता बताती है। उसका कोई पता नहीं चल रहा। पुलिस भी तलाश रही है। छोटी बच्ची अभी दिल्ली में अपनी बुआ के पास है। वही बच्ची की परवरिश करेंगी। -जैसा 13 साल की बच्ची के परिजनों ने बताया।

खबरें और भी हैं...