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कांग्रेस कर रही अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी:विधानसभा में दो सदस्य कम होने से संख्याबल में सरकार और मजबूत

राजधानी हरियाणा3 महीने पहलेलेखक: मनोज कुमार
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किसान आंदोलन के बीच विपक्ष के हमलावर होने से डिफेंसिव मोड में आई सरकार अब विधानसभा में संख्याबल के हिसाब से मजबूत हो गई है। चार दिन में ही दो विपक्षी विधायकों की सदस्यता खत्म होने पर विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 46 की बजाए अब 45 हो गया है। ऐसे में कांग्रेस की ओर से बजट सत्र में अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने पर सरकार को कोई खतरा नजर नहीं आता है।

सरकार के पास संख्याबल पहले से ही मजबूत है। परंतु अभय चौटाला के साथ कुछ निर्दलीयों और जजपा विधायकों की ओर से लगातार कृषि कानूनों को लेकर मुखर होने पर कहीं न कहीं सरकार भी विधानसभा में बहुमत के आंकड़े को लेकर असमंजस में जरूर थी।

मुख्यमंत्री मनोहर लाल की कैबिनेट मिनिस्टर एवं निर्दलीय विधायक रणजीत सिंह चौटाला व कुछ अन्य निर्दलीय विधायकों के साथ किए गए लंच और दिल्ली में डिप्टी सीएम दुष्यंत चौटाला द्वारा जजपा विधायकों के साथ की गई मीटिंग को भी सियासत में इसी से जोड़ा गया। परंतु अब विपक्ष के ही दो वोट कम होने से नंबर गेम में सरकार विधानसभा में मजबूत जरूर हुई है। 90 सदस्यों वाली विधानसभा में अब 88 विधायक रह गए। इसलिए सरकार को बहुमत के आकड़े के लिए 45 वोट की ही जरूरत है।

जानिए...विधानसभा में संख्याबल का गणित

2019 के विधानसभा चुनाव में 40 सीटें लेकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। सात निर्दलीय विधायकों ने समर्थन देने की घोषणा की। तुरंत ही जजपा ने 10 विधायकों के साथ गठबंधन किया और भाजपा-जजपा की सरकार बन गई। इस हिसाब से भाजपा के पास 57 का आंकड़ा हो गया, जबकि कांग्रेस 31 और इनेलो व हलोपा एक-एक सीट पर रही। परंतु पहले पूर्व मंत्री मनीष ग्रोवर के मामले में निर्दलीय विधायक बलराज कुंडु ने सरकार से समर्थन वापस लिया।

इसके बाद सोमवीर सांगवान ने कृषि कानूनों के विरोध में सरकार का साथ छोड़ दिया। कुछ निर्दलीय विधायकों ने जब सांगवान के साथ गुप्त मीटिंग की तो सरकार में हलचल हो गई, क्योंकि इससे पहले जजपा के विधायक जोगीराम सिहाग व रामकरण काला कृषि कानूनों का खुलकर विरोध कर चुके थे, वहीं डिप्टी सीएम के खिलाफ पूरी तरह बगावत कर चुके जजपा विधायक रामकुमार गौत्तम भी अन्य विधायकों की श्रेणी में खड़े हो गए।

यह भी जानें...

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के दो माह बाद ही सितंबर, 2013 में राज्य सभा के तत्कालीन कांग्रेसी सांसद राशिद मसूद की सदस्यता गई थी। इस फैसले से सदस्यता गंवाने वाले वे पहले जनप्रतिनिधि थे। इसके अगले माह ही अक्टूबर में राष्ट्रीय जनता दल के सांसद लालू प्रसाद यादव को अपनी लोक सभा सदस्यता से हाथ धोना पड़ा था।

राहुल गांधी ने साढ़े सात साल पहले फाड़ा था अध्यादेश

10 जुलाई, 2013 के लीली थॉमस बना भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए मनमोहन सरकार संसद में ऑर्डिनेंस लाई थी। इसमें यह था कि किसी जनप्रतिनिधि को दोषी करार दिया जाता है तो उसे 3 माह का समय मिले। यदि सजा पर स्टे हो जाए या ऊपरी कोर्ट सजा को खारिज कर देती है तो उसकी सदस्यता बनी रहेगी।

यह ऑर्डिनेंस जब संसद में पेश हुआ तो कांग्रेसी सांसद राहुल गांधी ने इसे बकवास बताते हुए फाड़ दिया था। इसके बाद यह ऑर्डिनेंस तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास हस्ताक्षर के लिए पहुंचा। परंतु वे भी इससे सहमत नहीं थे। उन्होंने उस वक्त के केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल को बुलाया और ऑब्जेक्शन बताए। इसके बाद 2 अक्टूबर, 2013 को इसे खारिज कर दिया गया।

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