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प्यासी धरा:जल की सेहत संकट में मॉनसून से धरती को आस

जींदएक महीने पहले
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  • 8 में 3 ब्लॉकों में जमीन का पानी पीने लायक नहीं
  • 5 ब्लॉकों में हैंडपंप सूखे, 10 साल में 12 मी. नीचे गया
  • जिन क्षेत्रों में जलस्तर ऊपर आया वहां का पानी खराब
  • माॅनसून आने पर मिलेगी कुछ राहत, एक से डेढ़ मीटर ऊपर आएगा पानी

जिले में भू-जल की दो तरह की समस्या बनी हुई है। जिन ब्लॉक में भू-जल पीने लायक है। वहां पर हर साल यह गहराता जा रह है। जिन ब्लॉक में भू-जल का स्तर ऊपर है वहां पानी का स्वाद लगातार बिगड़ता जा रहा है। जिले के 5 ब्लॉक जिनमें अलेवा, जींद, सफीदों, उचाना व उझाना शामिल हैं में हर साल भू-जल से एक मीटर तक नीचे जा रहा है। अलेवा व उझाना ऐसे ब्लॉक हैं जिनमें पिछले 10 साल में भू-जल स्तर 10 से 12 मीटर तक गहरा गया है। पानी के गहराई में पहुंचने के कारण हालात ये हो गए हैं कि अब गांवों में हैंडपंप भी नहीं लग पा रहे। भू-जल स्तर में गिरावट न आए इसको रोकने के लिए ग्रामीण द्वारा तो दूर की बात किसी विभाग या सरकार ने कोई कार्य योजना नहीं बनाई। इसी तरह से जिले के जुलाना, पिल्लूखेड़ा व नरवाना ऐसे ब्लॉक हैं जहां भू-जल स्तर हर साल ऊपर आ रहा है। लेकिन इसके ऊपर आने का कोई फायदा नहीं मिल रहा है। क्योंकि ज्यों-ज्यो भू-जल स्तर ऊपर आ रहा है इसका स्वाद बिगड़ रहा है। पानी नमकीन हो गया है और इसको पानी तो दूर की बात यह खेती को भी अब नुकसान पहुंचा रहा है। इसके चलते जिले में अब हर गांव व शहर में पेयजल के लिए जलापूर्ति विभाग की सप्लाई पर निर्भरता काफी बढ़ गई है।

जिले में हैं 30 हजार से ज्यादा ट्यूबवेल

जिले में हर साल ट्यूबवेल की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय 30 हजार से भी ज्यादा ट्यूबवेल जिले में लगे हुए हैं। इनमें 16 हजार से ज्यादा बिजली के ट्यूबवेल हैं, जबकि 14 हजार से ज्यादा डीजल इंजन से चलने वाले ट्यूबवेल लगे हुए हैं।

भू-जल स्तर गिरने का बड़ा कारण

जिले के जिन ब्लॉक में भू-जल स्तर हर साल गिर रहा है उसका बड़ा कारण उन एरिया में बिजली के बड़े ट्यूबवेल का लगा होना। पिछले कई सालों से खरीफ सीजन में धान की फसल उगाना है। जिले के जिन 5 ब्लॉक में भू-जल गहराया है, सबसे अधिक बिजली के ट्यूबवेल यहीं पर हैं।
भू-जल स्तर ऊपर आने का बड़ा कारण

जिले के 3 ब्लॉक जिनमें जुलाना, पिल्लूखेड़ा व नरवाना शामिल हैं। इनमें भू-जल स्तर का लगातार ऊपर आने व पानी की क्वालिटी खराब होने का बड़ा कारण 1995 में आई बाढ़ को माना जा रहा है। इन्हीं तीनों ब्लॉक में सबसे ज्यादा जलभराव हुआ था। अब भी हर साल होने वाली बारिश के बाद जलभराव हो रहा है।

10 साल पहले व अब कितना है भू-जल स्तर (मीटर में)

ब्लॉक का नाम    वर्ष 2010    वर्ष 2020    कितना गहराया/ऊपर आया अलेवा    20.39    31.07    10.68 जींद    15.16    19.56    4.40 जुलाना    5.76    04.71    1.05 (ऊपर आया) नरवाना    11.72    07.49    4.23 (ऊपर आया) पिल्लूखेड़ा    5.90    05.85    0.5  (ऊपर आया) सफीदों    10.33    15.29    4.96 उचाना    13.51    16.40    2.89 उझाना(नरवाना)    11.72    23.53    11.81

भू-जल नीचे जाने से हुए नुकसान

  •  पेयजल संकट बढ़ रहा है। पहले हर गांव में पेयजल के हैंडपंप लग जाता था, लेकिन भू-जल स्तर गिरने के कारण अब हैंडपंप नहीं लग पा रहे।
  •  पहले ट्यूबवेल लगाने पर कम खर्च आता था लेकिन अब ट्यूबवेल लगाने पर खर्च कई गुना बढ़ गया है। क्योंकि अब पाइप जमीन में ज्यादा उतारने पड़ते हैं।
  •  लगातार भू दोहन के कारण व जगह-जगह लगाए जा रहे ट्यूबवेल के कारण नीचे से जमीन खोखली हो रही है। इससे जमीन धंसने का खतरा बढ़ रहा है। 

इस बार धान के रकबे में आएगी कमी

भू-जल को लेकर इस बार किसानों की अच्छी पहल ये है कि सैकड़ों किसानों ने धान की जगह दूसरी फसल उगाने का फैसला लिया है। इसके चलते धान के रकबे में कमी आएगी। सरकार की योजना का फायदा उठाकर किसानों ने इस बार 12 हजार 530 एकड़ में धान की जगह दूसरी फसल जिसमें पानी की कम जरूरत पड़ती है उनकी बिजाई की है। जिले में हर साल धान का रकबा 1.45 लाख हेक्टेयर से ऊपर रहता था लेकिन इस बार यह 1 लाख 32 हजार हेक्टेयर के आसपास रहने की उम्मीद है।

माॅनूसन से भू-जल में आता है सुधार

हर साल जब भी माॅनसून आता है उससे भू-जल में सुधार आता है। क्योंकि बारिश होने से ट्यूबवेल बंद हो जाते हैं और सिंचाई के लिए पानी की जरूरत नहीं पड़ती। जहां ज्यादा बारिश होती है वहां पर एक से दो मीटर तक भू-जल स्तर माॅनसून सीजन में ऊपर आ जाता है। -डाॅ. मदनलाल खीचड़, कृषि मौसम विभाग, हरियाणा कृषि विव हिसार।

ऐसे ही रहा तो हो जाएंगे डार्क जोन घोषित

जींद जिले में कई ब्लॉक में हर साल भू-जल स्तर गिरता जा रहा है। यदि ऐसी ही चलता रहा तो फिर जल्द ये ब्लॉक डार्क जोन घोषित हो जाएंगे। इसका सबसे बड़ा नुकसान किसानों को होगा जो बिना परमिशन के ट्यूबवेल नहीं लगा पाएंगे। इसके लिए जरूरी है कि भू-दोहन कम से कम करे। -रुचिका नेहरा, भू वैज्ञानिक भू-जल विभाग जींद।

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