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सत्संग:व्यक्ति के अंतःकरण का फूल एकांत में खिलता है : दाऊजी

पानीपत9 महीने पहले
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दाऊजी महाराज। - Dainik Bhaskar
दाऊजी महाराज।

ैसा कि अवध धाम मंदिर के संस्थापक एवं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य दाऊजी महाराज ने कहा...  फूल हमेशा एकांत में ही खिलता है। फूल को खेलते हुए कोई विरला ही देख पाता है, क्योंकि फूल की परिभाषा ही एकांत है। जब वह एकांत में खिल जाता है फिर वह प्रयोग में लाया जा सकता है या फिर यह कहे फिर वह भगवान के चरणों के लायक हो सकता है। सरल भाषा में कहें कि फिर भगवान को वह फूल भक्तों द्वारा अर्पित किया जा सकता है। सीधा सा सिद्धांत हम सब पर भी लागू होता है कि हम भी एकांत में अपने मनो व्रतियों को समाप्त करके अपने मन के विकारों को समाप्त करके सकारात्मक ऊर्जा एकांत में प्राप्त करें। फिर हम क्यों ना प्रभु चरणों के लायक हो जाए वेद कहते हैं कि वही व्यक्ति भगवान के चरनाविंद हो सकता है।  जो व्यक्ति एकांत में अपने आप को प्रभु चरणों में समर्पित करने का भाव प्रकट कर चुका हो। प्रत्येक व्यक्ति को अपना एकांत संभालना चाहिए। जिस व्यक्ति ने अपना एकांत संभाल लिया या एकांत को सुरक्षित कर लिया वही व्यक्ति प्रभु के साधना के लायक हो पाया।

भक्तों की कोई परिभाषा नहीं है

दाऊजी महाराज ने कहा कि सीधी सी बात कि प्रभु को प्राप्त करने के लिए एकांत में तो आपको साधना करनी ही पड़ेगी।  जिसका एकांत ठीक हो गया उसका प्रांत ठीक हो गया। जिसका एकांत ठीक हो गया उसका मन शांत हो गया। जिसका मन शांत हो गया उसको ठाकुर की प्राप्ति हो गई। जिसको ठाकुर की प्राप्ति हो गई उसको दुनिया की ठोकर नहीं लगती। भक्तों की कोई परिभाषा नहीं है। वक्त की परिभाषा तो भगवान भी नहीं समझ पाए तो हम सांसारिक लोग कैसे समझ सकते हैं। आज यदा-कदा सभी लोग अपने आपको भक्त करवाने की होड़ में लगे हुए हैं, लेकिन वह भक्तों की परिभाषा का वर्णन और विवेचन नहीं जानते भक्त की कोई सीमा नहीं है। ना ही भक्ति की सीमा है।

बुद्धि तो केवल संसार के मापने का एक छोटा सा पैमाना है

दाऊ महाराज ने कहा कि सत्य बौद्धिक नहीं होना चाहिए। सत्य हार्दिक होना चाहिए। यदि सत्य बौद्धिक हो गया तो उसको मापने के लिए लोग अपनी-अपनी बुद्धि लगाने का प्रयत्न करेंगे। क्योंकि यह संसार अपनी बुद्धि लगाने में अति माहिर है सत्य तो हार्दिक होता है। सत्य के लिए बुद्धि का परीक्षण। बुद्धि का प्रमाण। बुद्धि योगिता की आवश्यकता नहीं पड़ती। बुद्धि तो केवल संसार के मापने का एक छोटा सा पैमाना है सत्य को बुद्धि नहीं माप सकती।
संसार के अंदर निष्फल होना कोई गुनाह नहीं

दाऊजी महाराज ने कहा कि संसार के अंदर निष्फल होना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि नीरू उत्साहित होना गुनाह है क्योंकि जब आपके अंदर उत्साह ही नहीं रहेगा। आप किस फल की आशा करेंगे। आप सब समझते हैं क्योंकि उत्साहित व्यक्ति ही किसी कार्य को प्रमाणित कर सकता है। फिर यह कहे कि किसी कार्य को सफल बना सकता है। यूं कहें कि किसी कार्य को मंजिल तक पहुंचा सकता है यदि आपके अंदर कार्य के प्रति उत्साह ही नहीं रहेगा तो वह कार्य कभी व्यक्ति कर ही नहीं पाएगा। यही हालात वर्तमान समय में इस महामारी में बन रहा है हमें इस दौरान सचेत रहकर निर्उत्साहित नहीं होना चाहिए। उत्साहित रहना चाहिए।

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