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जन संकल्प से हारेगा कोरोना:पत्नी का ऑक्सीजन लेवल 88 तक आ गया था, डॉक्टरों ने कहा- अस्पतालों में जगह नहीं है

पानीपत15 दिन पहले
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पानीपत. विकास बतरा और उनकी पत्नी रजनी बतरा। - Dainik Bhaskar
पानीपत. विकास बतरा और उनकी पत्नी रजनी बतरा।
  • खुद को मोटिवेट किया और संयम रख कोरोना को हरा दिया
  • गंभीर संक्रमण होने के बावजूद अपनी इच्छाशक्ति से कोरोना को हराने वालों के जज्बों की कहानियां,
  • पढ़िए आज सातवीं कड़ी- सेक्टर-11 निवासी 53 साल के यार्न कारोबारी विकास बतरा व उनकी पत्नी होम आइसोलेशन में रहकर ही ठीक हुए

“कोरोना में खुद को मोटिवेट करना बहुत जरूरी है। आपकी मदद आपसे ज्यादा और कोई नहीं कर सकता है, यह बात हर कोरोना मरीज जितनी जल्दी वह समझ जाएं, उनके स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। मेरी पत्नी रजनी की तबीयत ठीक नहीं थी। ऑक्सीजन लेवल 88 तक पहुंच गया।

डॉक्टर से बात की तो उन्होंने कहा कि अस्पतालों में जगह नहीं है, जितना प्रयास कर सकते हाे करो, ताकि घर पर ही ठीक हो जाओ। डॉक्टर के कहे अनुसार असहज दर्द में भी मेरी पत्नी दो-दो घंटे तक पेट के बल लेटी रहतीं। दिन में दो-दो बार इस तरह से लगातार किया तो ऑक्सीजन लेवल ठीक हुआ। अपने ही घर के एक कमरे में हम दोनों 15 दिनों तक कैद रहे।

आज हमने संयम से काेरोना को हराया। परहेज हर लेवल पर जरूरी है। परहेज किया तभी एक ही घर में रहते हुए अपने माता-पिता और दो बच्चों को पॉजिटिव होने से बचाया। 18 अप्रैल को पत्नी को गले में दर्द और बुखार आया। डॉक्टर से बात की और उनके कहे अनुसार पत्नी आइसोलेट हो गईं। 21 अप्रैल को मुझे भी इसी तरह के लक्षण आए। तो हम भी आइसोलेट हो गए। जांच कराई तो दोनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई तो एक साथ ही हम दोनों ने कोरोना से संघर्ष शुरू कर दिया।

चार-पांच दिनों के बाद अचानक से पत्नी का ऑक्सीजन लेवल कम हो गया। डॉक्टर ने कहा कि बाहर की स्थिति बहुत खराब है, घर पर ही भरसक प्रयास करो। हर तरह से भगवान ने हमें सक्षम बनाया है, लेकिन डाॅक्टर पर भरोसा किया और ठीक हुए। कोरोना ने जो हमें सिखाया, वह मैं दूसरों के साथ साझा करना चाहूंगा।

  • निगेटिविटी नहीं आने दो- मैंने तो सोशल मीडिया से दूरी बना ली। कोई भी अनाप-शनाप वाॅट्सएप नहीं देखता था। यहां तक कि घर से टीवी भी निकलवा दिया, ताकि कोई निगेटिव न्यूज न देखूं।
  • अस्पतालों में बेड नहीं है- शायद स्थिति ठीक होती तो मेरी पत्नी भी अस्पताल में भर्ती होतीं। मेरा तो कहना है कि जिसको बहुत जरूरी है, वहीं अस्पताल जाएं।
  • ऐसा नहीं कि बेड सुरक्षित रख लें या अस्पताल जाने की जरूरत नहीं फिर भी बेड लेकर अस्पताल में बैठे हैं- जिस कारण से असल में जिसको जरूरत है, उसे बेड नहीं मिल रही है।
  • सबसे जरूरी चीज: खुद को अपने आप मोटिवेट किया, आप भी करो। हर सुबह उठते ही दोनों यहीं कहते कि हम तो ठीक हैं। कहीं दिक्कत रहती तो भी हमने सहन किया। पता था कि घर में बुजुर्ग माता-पिता हैं। बेटा-बेटी है। जो घबरा सकते हैं।’ विकास बतरा | कोरोना वॉरियर
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