इतिहास रचा:मंगलवार को जन्मे म्हारे बजरंगबली के भक्त ने दिलाया देश काे कांस्य, छारा अखाड़े से गुर सीख पूनिया ने बुलंदियों को छुआ

झज्जर2 महीने पहले
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गांव छारा के वीरेंद्र अखाड़ा के पहलवान बजरंग पूनिया की जीत पर तिरंगा लहरा कर खुशी मनाते हुए। - Dainik Bhaskar
गांव छारा के वीरेंद्र अखाड़ा के पहलवान बजरंग पूनिया की जीत पर तिरंगा लहरा कर खुशी मनाते हुए।
  • खुड्डन के बजरंग पूनिया ने अपनी उपासना और कुश्ती के जज्बे को ओलिंपिक में कांस्य मेडल लाकर किया सिद्ध

बजरंगबली के भक्त बजरंग पूनिया ने शनिवार के दिन अपनी उपासना और कुश्ती के प्रति जज्बे को ओलिंपिक में कांस्य मेडल लाकर सिद्ध कर दिया। इनका जन्म मंगलवार को हुआ था। बजरंग की उपलब्धि पूरे देश में खुशी की लहर है। खास तौर पर उसके पैतृक गांव खुड्डन से लेकर उसे अंतरराष्ट्रीय पहलवानी की ट्रेनिंग देने वाले छारा अखाड़े के पहलवान जश्न में डूबे है। पैतृक गांव खुड्डन के लोग बजरंग पूनिया की शुक्रवार को ही ओलिंपिक में हार से निराश थे, लेकिन बजरंग पूनिया शनिवार को कांस्य जरूर जीत लेगा, इसका भरोसा सभी को था। सोनीपत में मौजूद बजरंग के पिता बलवान पूनिया ने भी पूरे भरोसे के साथ कहा था कि उसका बेटा कांस्य जरूर लाएगा और यही हुआ।

बजरंग पूनिया ने टोक्यो ओलंपिक के रेसलिंग इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी रिकॉर्ड जीत देश को देकर यह उपलब्धि अपने नाम की और पूरे देश को खुशी मनाने का मौका दिया। खुड्डन गांव के वे भी लोग जिनका कुश्ती से भी कोई नाता नहीं है उनके पास भी बधाई के फोन आने शुरू हो गए। देखते ही देखते दोपहर बाद पूरा का पूरा गांव कांस्य पदक विजेता और अपने लाडले बजरंग पुनिया की खुशी को मनाने में जुट गया। युवाओं ने बैंड बाजा और डीजे की धुन पर ओलिंपिक की जीत को सेलिब्रेट किया। नाच गाकर लोग एक दूसरे को मिठाई खिला रहे थे। गांव के हर किसी के चेहरे पर बजरंग पूनिया की जीत की खुशी देखी जा रही थी और हर निवासी अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहा था कि ओलिंपिक में कांस्य पदक विजेता बजरंग पुनिया ने अपने पहले ही ओलिंपिक में जिले के एक छोटे से गांव को विश्व स्तर पर प्रसिद्ध कर दिया। अब सीएम मनोहर लाल खट्टर ने गांव में स्टेडियम बनाने की घोषणा है। इसकाे लेकर भी गांव के लोग खुश हैं।

हमारे उठने से पहले बजरंग अखाड़े की सफाई कर लेता था

यह बात वर्ष 2003 की है, जब बजरंग पूनिया खुड्डन गांव से छारा के वीरेंद्र अखाड़ा में पहलवानी सीखने के लिए आया था वह मेरे साथ ही 5 साल तक रूम में रहा। मैं उसका सीनियर था। दीपक पूनिया भी मेरा जूनियर रहा है, लेकिन बजरंग पूनिया की कई खास बातें हैं जो उसे बहुत आगे तक ले जाती हैं। हम लोग अलसुबह सोकर उठते थे, लेकिन हमारे उठने से पहले ही बजरंग पूनिया अखाड़े की साफ सफाई कर लेता था। बजरंगबली को वह अपना आराध्य देवता मानता है। इसके बाद वह अखाड़े की उस मेट का उपासक रहा है, जो उसे कुश्ती के दाव पेच सिखाती है। मैं व्यक्तिगत रूप से खुश इस बात से हूं कि बजरंग मेरे साथ रहा। उसने इस दौरान कुश्ती को छोड़कर कभी भी किसी और मुद्दे पर कभी बेवजह बात नहीं की। अखाड़े में प्रैक्टिस करने के अलावा वह अपना दमखम दिखाने के लिए आगे बढ़कर मेलों और गांव में होने वाले मिट्टी के कुश्ती दंगल में बढ़-चढ़कर भाग लेता था। कुश्ती के प्रति उसका जुनून ही है कि वह अपने साथ रहे दीपक पुनिया के साथ ओलंपिक में गया। हालांकि, दीपक को निराशा मिली, लेकिन बजरंग ने दीपक की निराशा को खुशी में बदल दिया है। मैंने जब ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में गोल्ड जीता और इसके बाद 2015 के सीनियर नेशनल में ब्रॉन्ज लेकर आया तो सबसे ज्यादा खुशी बजरंग पूनिया और दीपक पूनिया को ही थी। हम तीनों ही एक साथ रूम मेट रहे हैं। -छारा में बजरंग पुनिया के रूममेट रहे नेशनल मेडलिस्ट सुनील पहलवान ने जैसा भास्कर को बताया

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