वर्ल्ड एंटी रेबीज डे:रेबीज से हर साल 20 हजार मौतें, फिर भी कुत्तों के काटने पर लोग लगाते हैं चूना, मिर्ची व अचार

झज्जर2 महीने पहले
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डॉ. अशोक वर्ल्ड एंटी रेबीज डे पर अपनी बात रखते हुए। - Dainik Bhaskar
डॉ. अशोक वर्ल्ड एंटी रेबीज डे पर अपनी बात रखते हुए।
  • रेबीज के मरीज को हवा, पानी, आग और रोशनी से लगने लगता है डर, कुत्तों के अलावा
  • अन्य जानवरों से होता है रोग, डॉ. अशोक ने बचाव के बताए उपाय

रेबीज ग्रस्त जानवरों के काटने से हर साल 20 हजार लाेगाें की मौतें भारत में हो जाती हैं, जबकि विश्व में इसका आंकड़ा 60 हजार का है। भारत में कुत्तों या अन्य जानवरों के काटने के बाद अब भी ग्रामीण एरिया में काटे गए घाव के स्थान पर हल्दी, चूना और मिर्ची लगाने अंधविश्वासी परंपरा है, जोकि रेबीज की बीमारी को थामने की बजाए और बढ़ा देती है।

यह बातें हिसार की लुवासा यूनिवर्सिटी के पब्लिक हेल्थ डिपार्टमेंट के पूर्व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अशोक भटेजा ने कहीं। वे वर्ल्ड एंटी रेबीज डे पर मंगलवार काे गांव हसनपुर के एमआर कॉलेज ऑफ वेटरनरी साइंस एंड रिसर्च सेंटर में आयोजित सेमिनार में बोल रहे थे। करीब 35 साल तक लुवासा यूनिवर्सिटी में वेटनरी से जुड़ी सेवाओं को देने के बाद डॉ. अशोक ने एमआर कॉलेज में डीन के पद पर सेवाएं ग्रहण की है।

यहां उन्होंने बताया कि रेबीज के प्रति शहरी क्षेत्रों में तो जागरूकता है, लेकिन अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्रों में अभी अंधविश्वास की परंपरा है। यही कारण है कि कुत्तों और अन्य जानवरों जिनमें रेबीज के विषाणु पाए जाते हैं उनके काटने से लोगों की मौत हो जाती हैं।

समय से इलाज करा लें तो बच सकती है जान

डॉ. अशोक ने कहा कि रेबीज ग्रसित जानवरों के काटे जाने का इलाज संभव है। अगर समय पर इसके इंजेक्शन लगवा लिया जाए। उन्होंने कहा कि इंजेक्शन नहीं लगाए जाने और देर होने पर यह विषाणु अप्रैल तक पहुंच जाते हैं, फिर बीमार ग्रस्त मरीज को हवा, पानी, आग और रोशनी से डर लगने लगता है। रेबीज के विषाणु रक्त वाहिनी के जरिए दिमाग तक पहुंच जाते हैं।

समूचे दिमाग को कंट्रोल में लेकर रोगी को लकवा मार देते हैं। धीरे-धीरे इंसान जानवर की मौत हो जाती है। डॉ. अशोक ने बताया कि ज्यादातर 16 साल तक के बच्चों में कुत्तों की काटने की घटनाएं देश भर में देखी जाती हैं। आवारा कुत्तों के काटने से यह बीमारी ज्यादा होती है।

जागरूक लोग अपने पेट एनिमल को समय-समय पर एंटी रेबीज के टीके लगाते हैं, लेकिन आवारा कुत्तों पर यह टीकाकरण अभियान चल नहीं पाता जो बेहद जरूरी है। आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या का यह नतीजा है कि मौजूदा समय में भी 15 से 20 लोगों के पीछे एक कुत्ता है।

पहले 14 इंजेक्शन लगते थे पेट में, अब केवल पांच

डॉ. अशोक भटेजा ने कहा कि रेबीज इंजेक्शन भारत में 1890 से ही प्रचलन में है। पहले यह पेट में लगते थे। 5 एमएल दवाई का एक इंजेक्शन 14 बार लगता था। अब काफी रिसर्च के बाद टिशु कल्चर के एंटी रेबीज इंजेक्शन बनने के बाद इनकी संख्या 5 हो गई है। दवा भी एक एमएल ईमेल की रह गई है।

कुत्तों के अलावा, इन जानवरों से होता है रेबीज रोग

कुत्तों के काटने के अलावा नेवला, सियार, बंदर, बिल्ली और चमगादड़ के काटने से रेबीज होता है। इंसानों के साथ-साथ अगर यह जानवर भैंस, गाय, भेड़, बकरी, घोड़ा और ऊंट को भी काट ले और इनका समय पर इलाज न हो तो ये जानवर भी रेबीज की बीमारी से मर सकते हैं।

कुत्तों की बढ़ती जनसंख्या पर शुरू हुई एबीसी योजना फेल

डॉ. अशोक भटेजा ने बताया कि केंद्र सरकार ने कुत्तों की जनसंख्या पर नियंत्रण के लिए एबीसी योजना का शुभारंभ किया था, जो देश के बड़े-बड़े शहरों और हिसार में भी चला, लेकिन यह योजना खर्चीली काफी थी, जो कामयाब नहीं हो सकी।

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