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समस्या से परेशान:सरपंचों की बागडोर ग्राम सचिवों के हाथों मे आई हस्ताक्षर करवाने के लिए भटकने को मजबूर युवा

नारनौल2 दिन पहले
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  • ग्राम सचिव अधिकांश समय बीडीपीओ कार्यालयों में नहीं मिलते

राज्य में सरपंचों का कार्यकाल पूरा होने के बाद उनका चार्ज लेकर ग्राम सचिवों को देने का सरकारी फैसला उन पर भारी पड़ रहा है, जो स्कूलों व कालेजों में प्रवेश तथा नौकरियों पाने के लिए फॉर्म भर रहे हैं। ऐसे ग्रामीण युवाओं को अपने दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाने के लिए इनकी तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। जानकारी के अनुसार ग्राम सचिव अपने काम के बोझ तले इस कदर दबे हैं कि वे अपने कार्यालयों में नहीं मिलते। इसका खामियाजा युवाओं को उठाना पड़ रहा है।

आजकल स्कूलों व कालेजों में प्रवेश तथा नौकरियों आदि के लिए फाॅर्म भरने का समय है। ऐसे समय में अनेक तरह के दस्तावेज तैयार करवाने के लिए सरपंचों के हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है, लेकिन हस्ताक्षर करने की शक्ति सरपंचों से छीनने के बाद उन्हें ग्राम सचिवों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दूसरी ओर ग्राम सचिव अधिकांश समय बीडीपीओ कार्यालयों में नहीं मिलते, जिस कारण वे बार-बार कार्यालयों के चक्कर काटने पर मजबूर हो रहे हैं।

अनेक निवर्तमान सरपंचों ने भी बताया कि अनेक तरह के दस्तावेजों जैसे रिहायशी प्रमाण पत्र, जाति प्रमाणपत्र, आधार कार्ड के अपडेट करने तथा किसानों को भी सरपंचों के हस्ताक्षर करवाने पड़ते हैं, लेकिन सरकार ने उनसे हस्ताक्षर करने की शक्ति लेकर सचिवों को दें दी है, जिस कारण ग्रामीण युवा उनके पास आकर अपनी व्यथा सुनाते हैं।

इस संदर्भ में निवर्तमान सरपंच कृष्ण कुमार हुडीना, विक्रम सिंह नूनी कला, अजीत सिंह सलूनी, रोहतास सागरपुर, विजयपाल गुवाणी, कमलेश मेई, मुकेश जाट गुवाना आदि अनेक सरपंचों ने मांग की है कि वित्तीय शक्तियों को छोड़कर आम लोगों की सुविधाओं को देखते हुए नए चुनावों तक उन्हें हस्ताक्षर करने के आदेश जारी किए जाने चाहिए।

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