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नाथ संस्कार:एक ही आसन पर 40 दिन की तपस्या,योगी बनने के लिए नींद भी वर्जित

रोहतकएक महीने पहलेलेखक: राजेश कौशल
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  • नाथ संप्रदाय में दीक्षा के लिए मन व इंद्रियों पर विजय के लिए बर्दाश्त कर रहे कर्ण भेदन का दर्द, बोलने, देखने, सुनने पर भी संयम का पहरा

आई पंथ के शक्तिपीठ अस्थल बोहर मठ में एक ही आसन पर योगी चंद्र नाथ और योगी वेदनाथ 40 दिन की अखंड तपस्या में लीन हैं। नाथ सिद्धों के बताए परम कल्याणकारी आध्यात्मिक मार्ग का यह पहला अनिवार्य लेकिन कठोर कदम है। जहां मन और इंद्रियों पर विजय के लिए ही कर्ण भेदन का दर्द भी हर पल पीना पड़ता है।

साधना अवधि में दवा या अन्य कोई उपचार लेने पर भी मनाही है। साथ ही गुरु आदेश पर बोलने, देखने, सुनने पर संयम का पहरा रहता है। वार्षिक मेले में महंत बाबा बालकनाथ योगी से अनुमति मिलने के बाद योगी युगल का गत शुक्रवार सुबह 10 बजे कर्ण भेदन संस्कार कर दिया गया। तब से वे एकांतवास में रहते हुए बाबा मस्तनाथ व गुरु गोरखनाथ का नाम जप और गुरु की बताई साधना पद्धति का निरंतर अभ्यास कर रहे हैं।

60 वर्ष पुरानी करत से लगाया चीरा

महंत डॉ. योगी विलासनाथ ने औघड़ से योगी बने चंद्रनाथ व वेदनाथ का कर्ण भेदन 60 वर्ष पुरानी करत (कर्ण भेदन का औजार) से किया। यह करत उनके गुरु सिद्ध शिरोमणि हजारीनाथ द्वारा विशेषज्ञता समझाने के बाद प्रदान की गई थी। करत को बड़ी सफाई व शुद्धता से सहेज कर रखा जाता है।

कबूतर के पंख से लगाते हैं तेल

दीक्षा के समय चीरा लगाने के बाद हर दिन कान की धुलाई नीम की पत्तियों में उबले पानी से होती है। उस पर नीम की पत्ती डालकर पकाए गए सरसों का तेल कबूतर के पंख से लगाया जाता है। ताकि घाव वक्त के साथ भरता रहे।

गुरु भी करते हैं इन्हें प्रणाम

साधनारत योगी में गुरु गोरखनाथ की छवि होती है। तभी नाथ सिद्धों ने फरमाया है कि दर्शनी योगी शिव की काया। लिहाजा जिस गुरु ने उनका कर्ण भेदन करते हुए दीक्षा दी है। उनको भी 40 दिन तक अपने चेले का (आदेश) नमस्कार करने की परंपरा है। बरसों से ये ही परंपरा है।

साधना खंडित होने पर संप्रदाय से बाहर

कर्ण भेदन के बाद योगी को जख्मी कानों का पूरा ख्याल रखना होता है। इसीलिए भी वे 40 दिन तक दिन-रात जागरण करते हैं। बोलने, सुनने, देखने से बचते हैं। क्योंकि किसी भी स्थिति में दबने से कान खंडित मानते हुए साधक को हमेशा के लिए नाथ संप्रदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है।

12वें दिन योगी पहनेंगे कुंडल

सारी क्रियाएं साधक आत्मज्ञान की ओर ले जाने वाली हैं। इसमें इंद्रियों पर लगाम लगती है। 40वें दिन साबर मंत्र से तपस्या रत साधक कराई जाती है। 12वें दिन कुंडल पहनाने का संस्कार बनेगा। -डॉ. योगी विलासनाथ, प्रचार प्रसार अध्यक्ष नाथ संप्रदाय।

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