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गणेश चतुर्थी: 10 दिन के लिए घर-घर विराजेंगे गणपति:आज स्थापना के बाद 19 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन विदा किए जाएंगे, जानिए क्या करें और क्या नहीं

रोहतकएक वर्ष पहले
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प्रतीकात्मक तस्वीर - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक तस्वीर

गणेश चतुर्थी का त्योहार आज से शुरू होने जा रहा है। आज से 10 दिन के लिए घर-घर विघ्न विनाशक गणपति विराजमान होंगे। रोहतक शहर के दुर्गा भवन मंदिर के पुजारी आचार्य मनोज मिश्र ने बताया कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस साल यह पर्व 10 सितंबर से शुरू हो रहा है। 19 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन गण‌पति को विदा किया जाएगा।

ज्योतिषाचार्य मनोज मिश्र ने बताया कि गणेश की कृपा से सुख-शांति और सौभाग्य मिलता है। मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन व्यक्ति को काला और नीला वस्त्र धारण नहीं करना चाहिए। इस दिन लाल या पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ होता है। गणेश चतुर्थी पूजन का शुभ मुहूर्त सुबह 7ः41 बजे से 10ः47 बजे तक और दोपहर 12ः20 बजे 01ः54 बजे तक शुभ रहेगा।

साथ ही मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रमा के दर्शन नहीं करने चाहिएं। इसे कलंक चतुर्थी भी कहते हैं। अगर भूलवश इस दिन चंद्रमा के दर्शन कर भी लें तो जमीन से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर पीछे की ओर फेंक दें।

यह है पूजन विधि

गणपति स्थापना के लिए सुबह स्नान-ध्यान करके गणपति के व्रत का संकल्प लें। इसके बाद गणपति की मूर्ति को लाल कपड़े के ऊपर रखें। फिर गंगाजल छिड़कने के बाद भगवान गणेश का आह्वान करें। भगवान गणेश को पुष्प, सिंदूर, जनेऊ और दुर्वा (घास) चढ़ाए। इसके बाद गण‌पति को मोदक लड्डू चढ़ाएं और मंत्रोच्चारण करके उनका पूजन करें। गणेश चालीसा का पाठ करें और अंत में आरती करें।

भगवान गणेश को लगाएं इसका भोग

गणेश पूजन करते समय दूध, घास, गन्ना और बूंदी के लड्डू मोदक का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान गणेश प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। गणपति को तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिएं। क्योंकि तुलसी ने भगवान गणेश को लम्बोदर और गजमुख कहकर शादी का प्रस्ताव दिया था। इससे नाराज होकर गणपति ने उन्हें श्राप दे दिया था।

गणेश जी के जन्म से जुड़ी कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार पार्वती माता स्नान करने के लिए जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर की मैल से एक पुतले का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंक दिए। माता पार्वती ने गृहरक्षा के लिए उसे द्वार पाल के रूप में नियुक्त किया। क्योंकि गणेश जी इस समय तक कुछ नहीं जानते थे, उन्होंने माता पार्वती की आज्ञा का पालन करते हुए भगवान शिव को भी घर में आने से रोक दिया। शंकरजी ने क्रोध में आकर उनका मस्तक काट दिया। माता पार्वती ने जब अपने पुत्र की ये दशा देखी तो वे बहुत दुखी हो गईं और क्रोध में आ गईं। शिवजी ने उपाय के लिए गणेश जी के धड़ पर हाथी यानी गज का सिर जोड़ दिया, जिससे उनका एक नाम गजानन पड़ा।

पार्वती की गोद में बैठे गणेश की प्रतिमा न करें स्थापित

भगवान शिव और माता पार्वती की गोद में बैठे हुए गणेश की मूर्ति नहीं लानी चाहिए। शास्त्रों में शिव-पार्वती की मूर्ति बनाना और उसे विसर्जित करना निषिद्ध है। गणेश जी की जिन प्रतिमाओं की सूंड दाईं ओर मुड़ी होती है, वो सिद्धिपीठ से जुड़ी होती है। इन प्रतिमाओं में अपार ऊर्जा होती है, गणेश जी के ऐसे मंदिर सिद्धिविनायक मंदिर कहलाते हैं। जैसे कि मुंबई का सिद्धि विनायक मंदिर है। घर में गणेश जी की ऐसी मूर्ति स्थापित नहीं करते है।

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