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जन संकल्प से हारेगा कोरोना:ऑक्सीजन लेवल 75 तक आ गया था, एक ही अस्पताल में भर्ती पति-पत्नी व बेटी-बेटे के बीच सुबह-शाम की वीडियो कॉलिंग बनी संजीवनी, फिर हारता गया कोरोना

रोहतक2 महीने पहले
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कोरोना को हराने वाले राजेश गुप्ता। - Dainik Bhaskar
कोरोना को हराने वाले राजेश गुप्ता।
  • अपनी इच्छा शक्ति से कोरोना को हराने वालाें की कहानियां
  • आज पढ़िए पुरानी अनाज मंडी में रहने वाले गुप्ता परिवार की जुबानी, पूरा परिवार संक्रमित होने पर भी नहीं टूटने दिया आत्मबल

महामारी की पहली लहर की चपेट में मेरा पूरा परिवार आ गया। ऑक्सीजन लेवल 75 तक घटने और फेफड़ों के संक्रमण ने मुझे दिल्ली के अग्रसेन इंटरनेशनल अस्पताल के आईसीयू में पहुंचा दिया। जहां दो ही दिन बाद पत्नी रिया गुप्ता और बेटी संजोली व बेटा केशव को भी कोरोना पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर भर्ती होना पड़ा।

परिवार के लिए यह सबसे कठिन दौर था। जब एक ही छत के नीचे होकर भी हम एक दूसरे से मिल भी नहीं सकते थे, लेकिन बेटी का वीडियो कॉलिंग के जरिए एक दूसरे को जोड़ने का आइडिया हौसले की संजीवनी बन गया। हमने फोन पर कभी नकारात्मक बात नहीं की। आपस में एक दूसरे को प्रेरित करते रहे। फिर तो कदम दर कदम कोरोना हारता चला गया। हुआ यूं कि पिछले साल 4 सितंबर को मुझे बुखार आया। सूंघने व स्वाद की क्षमता जाती रही। भूख भी खत्म हो गई। कोरोना की आशंका में तुरंत अपने को घर में ही अलग कमरे मं क्वाॅरेंटाइन किया।

जांच में रिपोर्ट निगेटिव आई। डॉक्टरों के मुताबिक टाइफाइड था। उसकी दवा भी शुरू हुई, लेकिन दो ही दिन में ऑक्सीजन लेवल घटते हुए 75 आ गया। इस मुश्किल हालात में मुझे 7 सितंबर को दिल्ली के अग्रसेन इंटरनेशनल अस्पताल ले जाया गया। जहां सुबह 4 बजे सीटी स्कैन करने पर फेफड़ों पर कोरोना का दुष्प्रभाव मिला। दो बार प्लाज्मा चढ़ाया गया। इस बीच पत्नी व दोनों बच्चों की भी रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई।

फिर तो पूरा परिवार अग्रसेन अस्पताल में भर्ती हो गया। आईसीयू के बेड पर पड़े हुए एक बार हिम्मत जवाब देने लगी। अपनों की दुआओं और भगवान खाटूश्याम के आशीर्वाद से संकल्प लिया कि इस कठिन दौर से हर हाल में बाहर निकलना है। तभी एक दिन बेटी ने वीडियो कॉलिंग करके हम सबको जोड़ दिया। रोज सुबह-शाम 10 से 15 मिनट ही बात हो पाती। क्योंकि खांसी आते रहने से हम ज्यादा बोल नहीं पाते थे। फिर भी इस तरीके का बीमारी से निकलने में खास योगदान रहा।

पत्नी व बच्चों को एक हफ्ते में अस्पताल से छुट्‌टी मिल गई। फिर भी डॉक्टरों की सलाह पर कुछ दिन के लिए उन्होंने अपने को क्वाॅरेंटाइन किया। इधर, संक्रमण ज्यादा होने से अस्पताल में मेरा संघर्ष जारी रहा। 23 अक्तूबर को दिल्ली के अस्पताल से छुट्‌टी मिल गई, लेकिन मेरी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव नहीं आई थी। इसके लिए भिवानी में रिश्तेदार के एक फ्लैट में 18 दिन फिर अकेले बिताना पड़ा। इसके बाद 37 दिन बाद 11 अक्तूबर को मेरी कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आई। फिर भी शरीर बेहद कमजोर होने से घर पर ही एक महीने और स्वास्थ्य लाभ लेना पड़ा। दरअसल, कोरोना के साथ यह संघर्ष साझा करने का मकसद मुश्किल हालात में भी हौसला नहीं छोड़ने का संदेश है। क्योंकि कोरोना से बाहर निकलने में दवाओं का अपना रोल है, लेकिन लोगों की दुआओं व मुश्किल में भी उम्मीद कायम रखने की जिद भी काम आई।

राजेश गुप्ता, कोरोना वॉरियर

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