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  • The Players Of Karoli Villagers Are Preparing Themselves, The Volleyball Academy Was Started In 1952, So Far More Than 80 Players Have Left The International Mark.

मंडे पॉजिटिव:कारोली के ग्रामीण खुद सुविधाएं जुटा तैयार कर रहे खिलाड़ी, 1952 में शुरू की थी वालीबॉल एकेडमी, अब तक 80 से अधिक खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोड़ चुके हैं छाप

निजामपुर13 दिन पहले
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काराेली में खिलाड़ियों काे प्रशिक्षण देते काेच।
  • अपने स्तर पर सुविधाएं जुटाकर तैयार की जा रही है खिलाड़ियों की नई पौध
  • खेल के दम पर कई युवा मिल्ट्री, पैरामिलीट्री और पुलिस बल में भर्ती होकर कर रहे हैं देश सेवा

जिला मुख्यालय से करीब 10 किलोमीटर दूर निजामपुर रोड पर स्थित है गांव कारौली। गुर्जर बाहुल्य इस गांव ने वालीबॉल खेल के दम पर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ी है। गांव के 80 से अधिक वालीबॉल खिलाड़ी देश-विदेश में दमखम दिखा चुके हैं। यही नहीं खेलकूद की बदौलत यहां के अनेक युवा सेना, अर्द्धसैनिक बलों, पुलिस में भर्ती होकर देश सेवा भी कर रहे हैं।

गांव में वालीबॉल खेल की शुरुआत वर्ष 1952 में रामजीलाल खटाणा ने की थी। तब से ग्रामीण अपने दम पर इसको चालू रखे हुए हैं। वर्ष 2005 में हरियाणा सरकार ने गांव के युवाओं का वालीबॉल खेल के प्रति रुझान व समर्पण को देखते हुए गांव में वालीबॉल कोच की नियुक्ति कर कुछ आर्थिक सहायता भी दी थी, लेकिन वर्ष 2010 में कोच की मृत्यु होने जाने के बाद से यह खेल भी गांव में मृतप्राय हो गया था। पिछले एक महीने से गांव में इस खेल को पुनर्जीवित करने के लिए ग्रामीणों ने अपने स्तर पर ही फिर से खेल नर्सरी शुरू की है, जिसमें 10 वर्ष से 25 वर्ष तक के 125 युवक इस समय वालीबॉल सहित योग व अन्य खेलों का प्रशिक्षण ले रहे हैं। प्रशिक्षण देने का कार्य कृष्ण कुमार योगा एक्स आर्मी, धर्मेंद्र शर्मा, तेजपाल योगा, श्रीचंद योगा, विजय सिंह व कृष्ण कुमार एमपीएड नि:शुल्क कर रहे हैं।

कोच कृष्ण कुमार ने बताया कि वालीबॉल खेल में स्वर्गीय रमेश खटाना, इंस्पेक्टर कृष्ण खटाना, इंस्पेक्टर फतेह सिंह, इंस्पेक्टर चंदगीराम, इंस्पेक्टर रामकिशन, इंस्पेक्टर रामजस, प्रदीप, पिंटू, रामकिशोर, मंगेज सिंह, सहमाल, रिटर आदि ने वालीबॉल खेल को बुलंदियों पर पहुंचाया और देश के लिए पदक भी जीते। इनकी खेल प्रतिभा ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। गांव के युवाओं में ही नहीं बच्चों में भी इस खेल के प्रति जबरदस्त लगाव है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि पिछले 7 दशक के दौरान गांव में करीब-करीब हर घर में वालीबॉल का कोई ना कोई खिलाड़ी रहा है। उनका कहना है कि अब यहां वालीबॉल सहित अन्य खेलों का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। खेल नर्सरी में विभिन्न खेलों के साथ-साथ फौज व पुलिस भर्ती के लिए फिजिकल की तैयारी भी युवाओं को कराई जा रही है। इसको लेकर युवाओं में खासा जोश व उत्साह है।

सरकार सहायता करे तो फिर हासिल कर सकते हैं खोया रुतबा : सरपंच

गांव के सरपंच राजेश कुमार बताते हैं कि वर्ष 2010 के बाद से गांव में वालीबॉल खेल करीब-करीब बंद सा ही हो गया था। इससे युवाओं की रुचि भी कम हो गई थी। इसको देखते हुए ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से फैसला लेते हुए खेल को पुन: चालू कर दिया है। ग्रामीणों का कहना है कि हम अपने गांव के नवयुवकों को पथभ्रष्ट नहीं होने देंगे और इनका ध्यान पढ़ाई व खेलों की तरफ ही रखेेंगे। ग्रामीण अपने स्तर पर खिलाड़ियों व प्रशिक्षणार्थियों को हल्का-फुल्का रिफ्रेशमेंट भी देते हैं।

इसमें गांव के लोगों के साथ-साथ पूर्व खिलाड़ियों व सर्विसमैन्स का विशेष सहयोग रहता है। उनका कहना है कि अगर सरकार रिफ्रेशमेंट, डाइट आदि के लिए आर्थिक सहायता के साथ-साथ कोच नियुक्त कर खेलों का सामान व अन्य सुविधाएं मुहैया करा दे तो गांव के खिलाड़ी फिर से वालीबॉल में सफलता के झंडे गाड़ देेंगे। उनका कहना है कि स्थानीय विधायक डॉ. अभय सिंह ने गांव के नवयुवकों की खेल के प्रति रूचि को देखते हुए खेल मैदान में स्टेज का निर्माण कराया है। इसके अलावा जब भी युवाओं व ग्रामीणों ने उनके समक्ष छोटी-मोटी जरुरत की बात रखी तो उन्होंने भरपूर सहयोग किया है। वे सरकारी स्तर पर भी सहायता मुहैया कराने को प्रयासरत हैं।

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