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संस्करों को सलाम:कोरोना मृतकों के संस्कार में श्मशान में बीत रहा दिन; रोज करने पड़ रहे 13-14 संस्कार, घर से प्रार्थना कर निकलते हैं कि आज कोई शव न आए

रेवाड़ीएक महीने पहलेलेखक: अजय भाटिया
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कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों को अपनों के कंधे नसीब नहीं हो पा रहे। - Dainik Bhaskar
कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों को अपनों के कंधे नसीब नहीं हो पा रहे।
  • कहा- जिन्हें अपनों के कंधे नसीब नहीं हुए, उन्हें सम्मान से विदा कर रहे हैं, बस यही तसल्ली है...
  • 172 संक्रमित मृतकों का संस्कार कर चुकी 8 युवा कर्मचारियों की टीम, सावधानी के कारण अब तक संक्रमण से बचे हैं

कोरोना संक्रमण से जान गंवाने वालों को अपनों के कंधे नसीब नहीं हो पा रहे। इन्हें सम्मान से विदा करने की जिम्मेदारी सरकारी कर्मचारियों के कंधों पर है, मगर झकझौर देने वाले काम के लिए उन्हें कलेजा मजबूत करना पड़ा। रेवाड़ी में 8 युवा कर्मचारी सालभर से कोरोना संक्रमितों की मृत्यु होने पर उनके अंतिम संस्कार की रस्म-क्रिया पूरी करते आ रहे हैं।

अब तक 172 मृतकों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। बेकाबू होते हालात में पूरा-पूरा दिन श्मशान में बीत रहा है। कई बार तो एक ही दिन में 13-14 शवों का भी अंतिम संस्कार करना पड़ रहा है। कर्मचारी कहते हैं कि इतनी मौतें डरा देने वाली हैं। इसलिए रोज सुबह घर से निकलते हैं तो प्रार्थना करते आते हैं कि आज कोई शव ना आए।

11 माह से शव उठा रहे, मगर एक बार भी नहीं हुए संक्रमित

कोरोना से पहले लावारिस शवों का अंतिम संस्कार भी नगर परिषद के ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी करते रहे हैं। लेकिन संक्रमण ने कहर ढाना शुरू किया तो रेवाड़ी नगर परिषद के सीएसआई संदीप सिंह के नेतृत्व में 8 युवा सफाई कर्मियों दीपक, देवेंद्र, राजेश, सुरेश, रतीश, प्रदीप, करण व अमित की टीम बनाई गई। ये सभी 34 से 40 साल के हैं। देवेंद्र ने बताया कि हम लगातार अपनी बदली हुई ड्यूटी कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई भी कर्मचारी संक्रमण की चपेट में नहीं आया है। हर शव का संस्कार करने के बाद पीपीई बदलते हैं। 8-10 शवों के संस्कार व किट पहनने में घंटों लग जाते हैं।

सोचा नहीं था श्मशान से दिन शुरू होकर यहीं खत्म होगा

अंतिम संस्कार करने वाली टीम में शामिल दीपक कुमार कहते हैं कि जून 2020 में स्वास्थ्य विभाग ने अंतिम संस्कार के लिए पहला पहला शव सौंपा था। कोरोना का डर सभी के दिमाग में था। जैसे ही शव को हाथ लगाया तो रुह कांप गई। जैसे-तैसे अंतिम क्रिया पूरी की। उस रात बेचैनी रही। परिवार ने रोका भी, मगर ड्यूटी तो करनी ही थी। मार्च तक एक-दो शव आने का सिलसिला चलता रहा, मगर इस अप्रैल और मई का शुरुआती सप्ताह कहर ढा रहा है। इस सवा महीने में 118 शव आ चुके। कभी 8-10 तो कभी 13-14 शवों के अंतिम संस्कार किए गए। सोचा नहीं था कि श्मशान से दिन शुरू होगा और यहीं खत्म होगा।

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