टीकरी बॉर्डर खुलेगा या नहीं?:दिल्ली हाईकोर्ट में BCCI की याचिका पर हुई सुनवाई; दिल्ली पुलिस का जवाब-हमने नहीं कर रखे रास्ते बंद

बहादुरगढ़7 महीने पहले
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किसान आंदोलन के चलते पिछले एक साल से बंद टीकरी बॉर्डर को खुलवाने के प्रयासों के बीच शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट में बहादुरगढ़ चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के सदस्यों द्वारा लगाई गई याचिका पर सुनवाई हुई। BCCI के वरिष्ठ उपप्रधान नरेन्द्र छिक्कारा ने बताया कि सुनवाई के दौरान पुलिस पुलिस के अधिकारियों ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल करते हुए बताया कि उनकी तरफ से रास्ते बंद नहीं किए गए है। रास्ता अभी फिलहाल खुला है। जिस पर कोर्ट ने अगली तारीख तय कर दी है। नरेन्द्र छिक्कारा का कहना है कि वह शनिवार को अपने वकीलों और BCCI के सदस्यों के साथ बॉर्डर का दौरा करते हुए बकायदा वीडियोग्राफी भी कराएंगे, जिससे कोर्ट में बंद रास्तों का सबूत पेश किया जा सके।

दोपहिया वाहन और एंबुलेंस के लिए खुला बॉर्डर

पिछले एक साल से रास्ता खुलवाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। कई बार किसान नेताओं से बात की। इतना ही नहीं हाईकोर्ट से लेकर मानव अधिकार आयोग तक का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद पिछले महीने नवंबर में दिल्ली पुलिस ने बॉर्डर पर की गई भारी भरकम बैरिकेडिंग हटा दी। फिर आपसी सहमति से टीकरी बॉर्डर पर 4 फीट का रास्ता खोल दिया गया था। उससे पैदल आने जाने वाले लोगों के अलावा दोपहिया वाहन व एंबुलेंस को राहत मिल गई। लेकिन दिल्ली को बहादुरगढ़ से जोड़ने वाला यह प्रमुख मार्ग बंद होने से औद्योगिक इकाइयों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

एक साल से बंद बॉर्डर

बता दें कि पिछले साल 26 नवंबर 2020 को पंजाब और हरियाणा के किसान कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर पहुंचे थे। तब से किसानों ने बॉर्डर पर ही डेरा जमाया हुआ है। किसानों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस ने बॉर्डर को एक तरह से सील कर दिया था? सीमेंट कंक्रीट की दीवार तक बनाई गई। हालांकि पिछले दिनों यह दीवार और भारी भरकम बैरिकेड हट चुके हैं। लेकिन बहादुरगढ़ से दिल्ली आने-जाने का यह प्रमुख रास्ता अभी भी बंद है।

30 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान

किसान केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानून को रद्द कराने में सफल हो गए। लेकिन बॉर्डर आज तक नहीं खुला। किसान आंदोलन के चलते अकेले बहादुरगढ़ को 30 हजार करोड़ का नुकसान हुआ है। यहां की 7000 इंडस्ट्री इस आंदोलन से प्रभावित हुईं, जिनमें 1600 फुटवियर बनाने वाले फैक्ट्रियां हैं। इनमें 5 लाख से ज्यादा मजदूर काम करते थे, जो काम न होने के कारण पलायन कर गए।

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