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सिंघु-टिकरी बॉर्डर पर किसानों की दीपमाला:आंदोलन में जान गंवा चुके किसानों के नाम जलाए दीये; दीपावली पर रोज की तरह सजा मंच

रेवाड़ी7 महीने पहले
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सिंधु बॉर्डर पर दीप जलाते किसान। - Dainik Bhaskar
सिंधु बॉर्डर पर दीप जलाते किसान।

3 नए कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमा पर सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर डेरा डाले किसानों ने दीपावली की शाम आंदोलन के दौरान जान गवां चुके किसानों की याद में दीपमाला की। दोनों ही बॉर्डर पर जगह-जगह किसानों के कैंप के सामने दीये जलते हुए दिखाई दिए। दीपों की रोशनी से आंदोलन स्थल चमकता हुआ नजर आया।

सिंधु बॉर्डर पर दीप जलाते किसान।
सिंधु बॉर्डर पर दीप जलाते किसान।

दरअसल, किसानों ने इस बार दीपावली पर दो दीये शहीद किसानों के लिए अपील की थी। सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर बड़ी संख्या में डटे किसानों ने शाम होते ही दीये जलाए और आंदोलन के संघर्ष में मारे गए किसानों को याद किया। किसान आंदोलन के बीच किसानों की यह दूसरी दीपावली है। पिछली बार भी किसानों ने दीपावली नहीं मनाई थी। वहीं 26 नवंबर को किसान आंदोलन को 1 साल पूरा हो रहा है।

टिकरी बॉर्डर पर दीप जलाते हुए किसान।
टिकरी बॉर्डर पर दीप जलाते हुए किसान।

बता दें कि हरियाणा के सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर पिछले 11 महीने से ज्यादा समय से किसान 3 कृषि कानूनों के विरोध में धरना देकर बैठे हुए है। दोनों ही बॉर्डर पर अभी भी बड़ी संख्या में किसान डटे हुए है। आंदोलन में शामिल बहुत कम ही किसान दीपावली पर घर पहुंचे है। आंदोलन में शामिल बुजुर्ग महिलाएं भी दीपावली पर घर जाने की बजाए बॉर्डर पर ही किसानों के बीच बैठी रही।

रोजाना की तरह गुरुवार की सुबह से शाम तक सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर मंच सजा। उसके बाद किसानों का भाषण शुरू हुआ। हर रोज की तरह पंडाल में शाम तक किसान बैठे रहे। बाद में मंच के पास और अपने कैंपों के पास दीप जलाए गए।

दीपावली के दिन टिकरी बॉर्डर पर मौजूद किसान।
दीपावली के दिन टिकरी बॉर्डर पर मौजूद किसान।

500 से ज्यादा किसानों की हो चुकी मौत
कृषि कानूनों के विरोध में पिछले साल पंजाब की धरती से किसानों का आंदोलन शुरू हुआ था, जो अब हरियाणा, पश्चमी यूपी से लेकर कई अन्य राज्यों में फैल चुका है। दिल्ली को जोड़ने वाले हरियाणा के सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर बड़ी संख्या में कई राज्यों के किसान बैठे हुए है। आंदोलन के बीच ही 500 से ज्यादा किसानों की मौत हो चुकी है। कोई सड़क हादसे में तो कोई आंदोलन स्थल ठंड-गर्मी और बीमारी की वजह से मर गया। इन्हीं किसानों की याद में आज दो दीये जलाए गए हैं।