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रैपिड ट्रांजिट सिस्टम प्रोजेक्ट अनलॉक:मेट्रो के लिए पाइल टेस्टिंग शुरू, रिपोर्ट के आधार पर बनेंगे पिलरों के डिजाइन

रेवाड़ी2 महीने पहले
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8 माह की प्रक्रिया के बाद होगा निर्माण, 5 साल लगेंगे पूरा होने में - Dainik Bhaskar
8 माह की प्रक्रिया के बाद होगा निर्माण, 5 साल लगेंगे पूरा होने में
  • लॉकडाउन के चलते अटका काम दोबारा प्रारंभ, फरवरी में हुआ था मिट्टी का परीक्षण
  • 2021 की शुरुआत में ही हो जाता निर्माण शुरू, कोरोना के चलते रुक गया था काम
  • दिल्ली-गुड़गांव-अलवर के अलावा धारूहेड़ा और बावल में भी बनाए जाएंगे मेट्रो स्टेशन

लॉकडाउन के चलते रुका रीजनल रैपिड ट्रांजिट सिस्टम (आरआरटीएस) कॉरिडोर प्रोजेक्ट आखिर शुरू हो गया है। जिले के धारूहेड़ा और बावल में सॉयल टेस्टिंग (मिट्टी परीक्षण) की रिपोर्ट आने के बाद अब पाइल (जमीन के अंदर पिलर) टेस्टिंग की तैयारी है। एनएच-48 के पास बावल एरिया में टेस्टिंग के लिए सरियों से पाइल बनाने का काम इसी सप्ताह से शुरू हो गया है। फिलहाल धारूहेड़ा व बावल में 10 जगहों पर यह टेस्टिंग होगी।

इससे यह पता लगेगा कि इस रैपिड मेट्रो लाइन का बोझ (लोड) उठाने के लिए पिलर किस तरह के होंगे। इस परीक्षण के बाद पिलरों के डिजाइन का काम किया जाएगा। आरआरटीएस के इंजीनियरों का मानना है कि इस पूरी प्रक्रिया में करीब 7 से 8 माह का वक्त लग सकता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम (एनसीआरटीसी) द्वारा इस काम के बाद ही रैपिड मेट्रो के लिए ट्रैक बिछाने की दिशा में प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। हालांकि वर्ष 2021 की शुरूआत में ही निर्माण शुरू हो जाना था, मगर कोरोना महामारी ने पूरी व्यवस्था के साथ ही इस प्रोजेक्ट की रफ्तार भी रोक दी थी।

अब फिर से काम शुरू होने से उम्मीद है कि इस बार निर्बाध तरीके से काम आगे बढ़ जाएगा।दिल्ली - जयपुर हाईवे के साथ-साथ पिलरों के ऊपर मेट्रो का ट्रैक गुजरेगा। इसलिए बोरिंग के माध्यम से सैंपल लिए जा रहे हैं। इन सैंपल की रिपोर्ट से मिट्टी की क्षमता आंकी जाएगी। रिपोर्ट आने के बाद ही ये तय होगा कि इस इलाके की मिट्टी पर मेट्रो प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए किस तरह के पिलरों की जरूरत होगी। क्षेत्र के लिए अपने आप में ये सबसे बड़ी सौगात होगी, क्योंकि रेवाड़ी के साथ ही बावल और धारूहेड़ा में भी स्टेशन बनाए जाएंगे। निर्माण कार्य शुरू होने के बाद पूरा होने में करीब 5 साल का वक्त लगेगा।

जमीन में 30 मीटर तक भरेंगे कंक्रीट

एनसीआरटीसी द्वारा विभिन्न फर्म को कॉन्ट्रेक्ट देकर फरवरी माह में मिट्टी परीक्षण के लिए सैंपलिंग कराई गई थी। प्रोजेक्ट पर लगे अधिकारियों ने बताया कि टेस्टिंग के लिए हर 100 मीटर दूरी पर बोरिंग मशीन से बोर करके मिट्टी के सैंपल लिए गए तथा करीब 50 मीटर गहराई तक बोर किया गया। इन्हें जांच के लिए जयपुर की लैब में भेजा गया। पहले गुड़गांव से आगे धारूहेड़ा, अगले चरण में बावल से शाहजहांपुर बॉर्डर तक अलग-अलग चरणों में सॉयल टेस्टिंग का काम किया गया।

इसी दौरान मार्च माह में कोरोना महामारी से काम प्रभावित भी हुआ। अब जमीन के अंदर पाइल लोड टेस्टिंग की जा रही है। इसके लिए लोहे के गोलाकार जाल में कंक्रीट भरकर जमीन के अंदर डाले जांएगे। इनमें कंक्रीट मसाला भरा जाएगा। धारूहेड़ा व बावल में टेस्टिंग के लिए फिलहाल 10 ही जगहों का चयन किया गया है। जल्द ही टेस्टिंग का काम शुरू होगा।

3 चरणों में पूरा होगा काम

दिल्ली-गुड़गांव-अलवर आरआरटीएस परियोजना को 3 चरणों में लागू किया जाना है। तीनों चरणों को मिलाकर कॉरिडोर की कुल लंबाई 199 किमी है। पहले चरण में दिल्ली-गुड़गांव-एसएनबी अर्बन कॉम्प्लेक्स (106 किमी) का निर्माण किया जाएगा। एस एनबी से अर्थ है शाहजहांपुर, नीमराणा व बहरोड। अगले चरण में सोतानाला व अलवर तक लाइन बिछेगी।

प्रोजेक्ट की खास बातें

  • कॉरिडोर में 22 स्टेशन होंगे। इनमें जिले में शहर से कुछ दूरी पर, बावल व धारूहेड़ा में भी स्टेशन होंगे।
  • प्रत्येक 5 से 10 मिनट में उपलब्ध होगी ट्रेन।
  • ट्रेनों की डिजाइन गति 180 किमी. प्रति घंटा होगी
  • औद्योगिक क्षेत्रों के लिए आधुनिक ट्रांसपोर्ट होगा। इकाइयों को बड़ा फायदा मिलेगा।

ये रहेगी प्रक्रिया...

पता लगाएंगे कैसे पिलर चाहिएं

पाइल टेस्टिंग के माध्यम से इस क्षमता का आंकलन होता है कि इस इलाके की मिट्टी में कितनी क्षमता के कंक्रीट और पिलर कामयाब रहेंगे। क्योंकि पुलों का निर्माण आगामी 100 वर्षों को ध्यान में रखकर किया जाता है।

डिजाइन सेल में जाएगी इसकी रिपोर्ट

पाइल टेस्टिंग के बाद इनकी तमाम रिपोर्ट और आंकड़ों के साथ डिजाइन सेल में भेज दिया जाएगा। यहां पिलरों के डिजाइन तैयार होंगे। इन डिजाइन को पास कराने के लिए संबंधित शाखा और अधिकारियों के पास रिपोर्ट जाएंगी।

7-8 माह में होगा काम पूरा

इंजीनियरों के अनुसार डिजाइन पास होने तक की प्रक्रिया में आमतौर पर 7 से 8 माह का वक्त लग जाता है। इसके बाद एनसीआरटीसी पर निर्भर होगा कि इसका निर्माण कितनी तेजी से शुरू कराते हैं।

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