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सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद की 121वीं जयंती:पिता ने दिया था पूर्णमल की हत्या का आदेश पर भक्ति व चरित्र से हुए महान

राईएक महीने पहले
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  • सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद की 121वीं जयंती, जाटी कलां में हुआ सांग

सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद की 121वीं जयंती पर तीन दिवसीय सांग कार्यक्रम गुरुवार से जाटी कलां गांव में शुरू हुआ। पहले दिन सूर्यकवि के पौत्र सांगी विष्णुदत्त कौशिक ने भगत पूर्णमल का सांग किया। उन्होंने सूर्यकवि की रचना के बारे में बताया कि गुरु गोरखनाथ के वरदान से स्यालकोट के राजा सुलेमान की पत्नी इच्छरादे ने पूर्णमल को जन्म दिया था। बेटे को किसी की नजर न लगे, इसलिए पिता ने उसे 12 साल तक एक अंधेरे महल में रखा था।

सूर्यकवि पंडित लख्मीचंद के पौत्र सांगी विष्णुदत्त कौशिक ने सांग शुरू करते हुए बताया कि पंजाब प्रांत के स्यालकोट शहर में राजा सुलेमान राज करते थे। राजा सुलेमान की दो रानी थी। बड़ी रानी का नाम इच्छरादे और छोटी रानी का नाम नूणादे था। राजा के कोई संतान नहीं थी। एक बार गुरु गोरखनाथ स्यालकोट शहर में आए। राजा सुलेमान व रानी ने उनकी खूब सेवा की। सेवा से खुश होकर गोरखनाथ ने बड़ी रानी इच्छरादे को पुत्रवती होने का वरदान दिया और पुत्र का नाम पूर्णमल रखने का आदेश दिया। जब पुत्र का जन्म हुआ तो राजा सुलेमान ने अपने बेटे को 12 साल तक अंधेरे महल में रखा और वहीं पर उसकी पढ़ाई- लिखाई का भी प्रबंध किया।

12 साल बाद जब पूर्णमल भौरे से निकला तो उसकी विद्या के चर्चे दूर- दूर तक फैल गए। पूर्णमल की शादी के लिए रिश्ते आने शुरू हो गए। जब राजा सुलेमान ने कहा कि 360 रिश्ते आ चुके हैं तो पूर्णमल अपनी पसंद की लड़की से शादी कर सकता है। इस पर पूर्णमल शादी करने से इंकार कर देता और पिता को कहता है कि वह तपस्या करेगा। इस बीच एक दिन भगत पूर्णमल अपनी मौसी नूणादे से मिलने के लिए उसके महल में जाता है। जहां की रागिणी बेटे की सुण भाजी आई दस पन्दरा डंग धरकै, पूर्णमल के दर्श करण की समो मिली मर पडकै।

अपने सौतले बेटे की सुंदरता पर मौसी नूणादे मोहित हो जाती है और पूर्णमल के सामने शादी का प्रस्ताव रखती है। पूर्णमल मौसी को कहता है कि मां और मौसी में कोई अंतर नहीं होता। वह मौसी के महल से बाहर आ जाता है। नूणादे भगत पूर्णमल पर झूठा आरोप लगा देती है कि उसने उसके पतिव्रता धर्म को भंग करने का प्रयास किया।

राजा बेटे पूर्णमल की हत्या का आदेश देता है। जो जल्लाद पूर्णमल को मारने के लिए लेकर चले थे, वे उसे अंधे कुएं में फेंंक कर वापस आ गए। कई वर्ष बाद गुरुगोरख नाथ ने कुएं से पूर्णमल को बाहर निकाला। पूर्णमल अपनी भक्ति, शक्ति व चरित्र की वजह से प्रसिद्ध हुए। राजा सुलेमान को भी अपनी गलती का अहसास होता है।

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