ग्रंथों के अध्ययन से खत्म होगा मोह व क्लेश:दलाई लामा बोले- खुद में न आने दें मैं का भाव, आगे बढ़ने में बनता है बाधा

धर्मशाला2 महीने पहले
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कोरियाई बौद्ध संघ के अनुरोध पर तिब्बतियों के आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने मैक्लोडगंज स्थित चुग्लाखंग बौद्ध मठ में दो दिवसीय शिक्षाओं के दूसरे दिन आचार्य नागार्जुन रचित मूलमध्यमककारिका ग्रंथ पर प्रवचन दिया। दलाई लामा ने कहा कि इस दुनिया में दूसरे बुद्ध के रूप में आचार्य नागार्जुन को माना जाता है। उन्होंने बुद्ध के शासन और दर्शन की बहुत अच्छी व्याख्या की है। इसलिए उनका स्थान महत्वपूर्ण है।

दलाई लामा ने कहा मोह को कम करना है ताे ग्रंथों का अध्यन्न करना चाहिए। जैसे-जैसे आप ग्रंथों का अभ्यास करेंगे। वैसे-वैसे हमारे मन में क्लेश खत्म होते जाएंगे। इससे भी ज्यादा खुद में मैं का भाव न आने दें। मैं कोरिया से, मैं तिब्बत से हूं... यह किसी की पहचान नहीं है। ऐसे हम सच्चाई को प्राप्त नहीं कर सकते हैं। मेरी तरह सभी ध्यान लगाया करें और अपने मन की आशक्ति को बाहर निकालें। मैं का भाव और मोह हमेशा आगे बढ़ने में बाधा बनता है।

सुख व शांति के लिए करें कार्य
सभी का कर्तव्‍य सुख व शांति के लिए कार्य करें। दुनिया के हित के बारे में सोच सकते हैं तो जरूर सोचें। ऐसा न सोचें कि अकेला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता है। हम इस पृथ्वी के प्राणी हैं तो जितना हो सके उतना लोगों के हित और शांति के लिए काम करें। यह हम सभी की जिम्मेदारी भी है। चाहे हम धार्मिक व्यक्ति हों या न हों, सभी का कर्तव्य है कि सभी के सुख और शांति के लिए काम करें। दुखों के सेतु को पकड़कर रखने से कभी सुख नहीं मिलता है।

क्रोध व भय को कम करने की ओर करें प्रयास
इससे दुख और बढ़ता ही जाएगा। इसलिए जितना हो सके शून्यता पर चिंतन करें। हमारे ऐसे काम से मनुष्य के साथ साथ जीव जंतु भी सुखी रहेंगे। जब तक मेरा जीवन है पृथ्वी के रहने वाले लोगों के सुखों पर काम करूंगा, ऐसा विचार होना चाहिए। क्रोध व भय को कम करने की ओर प्रयास करना चाहिए। मेरे मित्र, शत्रु आदि से आशक्ति पैदा होती है। इसलिए क्रोध व भय को कम करने की ओर प्रयास करना चाहिए।

प्रवचन देने जाते आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा।
प्रवचन देने जाते आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा।

अभ्यास और परीक्षण से होगी कृतत्व की प्राप्ति
जब हमारे मन में स्वतंत्र रूप से कोई चीज नहीं है तो सब नाम मात्र रह जाएगा और कुछ नहीं होगा। चित को एक विषय भगवान बुद्ध में बहुत अच्छी व्याख्या की है। वैसे हमें देखना और अच्छा तो बहुत कुछ लगता है, लेकिन बिना परीक्षण किए हम असल में जो अच्छा है उसे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। बिना परीक्षण किए लौकिक व्यवहार के रूप में स्वीकार न करें। अभ्यास और परीक्षण करते हुए कृतत्व की प्राप्ति होगी।

अनुयायियों के पूछे सवालों का दिया जवाब
​​​​​​​शून्यता को नहीं मानेंगे तो आप जो भी देखते हैं उसको सत्य मान लें। नागार्जुन के ​​​​​​​ग्रंथों के विभिन्न अध्यायों का संक्षिप्त में वर्णन किया। जिसमें जन्म, कर्म, ध्यान, मोह, परीक्षण, तत्व, राग, धर्मसिद्धि, उत्पत्ति, संस्कृति धर्म, कर्म कारक परीक्षा मुख्य रूप से शामिल रहे। इससे पूर्व उन्होंने अनुयायियों के ओर से आए हुए कुछ प्रश्नों का जवाब भी दिया।