रह जाएंगी यादें:मैक्लोडगंज में ब्रिटिश राज में कायम धर्मशाला का इतिहास बताती 160 साल पुरानी दुकान अगले महीने हो जाएगी बंद

धर्मशालाएक वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
इसी दुकान के साथ बुक शॉप चलाने वाले प्रेम सागर जो टूर एंड ट्रैवल का भी कारोबार करते हैं का कहना है कि यह स्टोर कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह है। - Dainik Bhaskar
इसी दुकान के साथ बुक शॉप चलाने वाले प्रेम सागर जो टूर एंड ट्रैवल का भी कारोबार करते हैं का कहना है कि यह स्टोर कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह है।
  • 1860 में स्थापित,नौरोजी एंड संस जनरल स्टोर हिमाचल प्रदेश की सबसे पुरानी दुकानों में से एक है
  • 160 साल पहले शुरू हुई इस दुकान का इन्फ्रास्ट्रक्चर लकड़ी का बना हुआ है जो आज भी आकर्षण का केंद्र है

(प्रेम सूद). ब्रिटिश औपनिवेशिक का अर्थ अधिकतर भारतीयों के लिए केवल फिल्मों या किपलिंग के उपन्यासों में ही मौजूद है। लेकिन धर्मशाला के मैक्लोडगंज में ब्रिटिश राज में कायम 160 साल पुरानी प्रतिष्ठित दुकान अगले महीने बंद होने जा रही है। मैक्लोडगंज मुख्य चौराहे पर स्थित नौरोजी एंड संस जनरल मर्चेंट शॉप देश-विदेश से मैक्लोडगंज घूमने-फिरने आने वाले पर्यटकों को भारत के औपनिवेशिक अतीत की ओर ले जाती थी,जो बीते युग के अवशेषों को प्रदर्शित करती थी। 1860 में स्थापित,नौरोजी एंड संस जनरल स्टोर हिमाचल प्रदेश की सबसे पुरानी दुकानों में से एक है। 160 साल पहले शुरू हुई इस दुकान का इन्फ्रास्ट्रक्चर लकड़ी का बना हुआ है जो आज भी आकर्षण का केंद्र है। मैक्लोडगंज शहर के मध्य में स्थित यह दुकान तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के निवास से मुश्किल से एक किलोमीटर की दूरी पर है। मैक्लोडगंज के इस पारसी परिवार ने संपत्ति बेच दी है और व्यवसाय को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पारसी परिवार नौरोजी द्वारा स्थापित इस दुकान ने परिवार की 6 पीढ़ियों को देखा है।

दलाई लामा के एक दोस्त नौज़र नौरोजी 60 साल से अधिक समय तक अपने परदादा द्वारा स्थापित स्टोर-कम-निवास की देखभाल करते थे। पांच भाइयों में सबसे बड़े नौज़र, जिनके बेटे अब पश्चिम बंगाल में चाय के व्यवसाय में हैं,1915 में कराची में पैदा हुए थे और वर्ष 2002 में 85 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। नौज़र नौरोजी का छोटा बेटा परवेज नौरोजी व् बड़ा भाई गुरुष नौरोजी इन दिनों मैक्लोडगंज में दुकान को बंद कर प्रॉपर्टी को बेचने के लिए आए हुए थे। उनका कहना है कि यह एक कठिन निर्णय है लेकिन कभी-कभी आपको चीजों को छोड़ देना पड़ता है। परवेज नौरोजी निजी कंपनी से सेवानिवृत्त हैं और 2010 से केयरटेकर की मदद से दुकान चला रहे थे। नोजेर नौरोजी के बड़े बेटे कुरुष नौरोजी पश्चिम बंगाल में चाय का व्यवसाय करते हैं। वर्तमान में वह यहां से अपना सामान एकत्र करने और व्यवसाय को समेटने के लिए आए हुए थे।

नादिर शॉ नौरोजी के पांच बेटों में से सबसे बड़े-नौज़र नौरोजी ने 23 साल की उम्र में दुकान संभाली। नौज़ेर का जन्म 11 सितंबर, 1915 को हुआ था। उनकी मृत्यु 25 अक्टूबर, 2002 को हुई थी। दलाई लामा के साथ उनकी अच्छी दोस्ती थी। संयोग से, नौजर की मृत्यु से एक दिन पहले, वह पास के जंगल में टहलते हुए दलाई लामा से मिले, जहां से दलाई लामा अपनी कार में जा रहे थे। दलाई लामा ने उन्हें देखा और अंतिम समय के लिए अपने पुराने मित्र को बधाई देने के लिए अपनी कार रोक दी। ये हिमाचल प्रदेश की सबसे पुरानी दुकान रोजी एंड संस है जिसे बाद के वर्षों में 1860 में नौरोजी एंड संस का नाम दिया गया। इसे पारसी परिवार नौरोजी ने ब्रिटिश काल में खोला था। दलाईलामा जब वर्ष 1960 में धर्मशाला आए थे,उस समय मैक्लोडगंज के नौरोजी परिवार और बूटा राम ने उनका स्वागत किया था। कई वर्षों तक इसे दलाई लामा के दोस्त नौजेर नौरोजी इसे चलाते रहे। ब्रिटिश टाइम में यहां बेकरी आइटम, टोबैको, शराब और हथियार तक बेचे जाते थे। लेकिन नौजेर नौरोजी 2002 में निधन के बाद यहां सिर्फ न्यूज पेपर, मैगजीन और कन्फेक्शनरी आइटम बेचे जाते थे।

वर्ष 1905 में, कांगड़ा घाटी में आए शक्तिशाली भूकंप ने भारी तबाही मचाई जिससे अधिकांश स्थानीय निवासी लोअर धर्मशाला और आसपास के अन्य सुरक्षित क्षेत्रों में चले गए। लेकिन नौरोजी परिवार ने इसी क्षेत्र में रहना जारी रखा और अधिक उत्साह और आशा के साथ स्टोर चलाया। परिवार की 6 पीढ़ियों ने धर्मशाला की नियति को आकार लेते देखा है। उनकी दुकान नौरोजी एंड संस। वाइन और जनरल मर्चेंट्स की स्थापना 1860 में हुई थी, जो कि मैकलॉडगंज में अपनी तरह की पहली दुकान थी जिसने ब्रिटिश आर्मी कैंटोनमेंट के साथ-साथ भारतीयों ज्यादातर गद्दी समुदाय की जरूरतों को पूरा किया। वाइन और जनरल मर्चेंट्स की दुकान में कई ऐसे उत्पादों के विज्ञापन हैं जो दशकों पहले बेचे गए थे और इस छोटे से हिल स्टेशन पर ग्राहकों को उपलब्ध कराई गई वस्तुओं की श्रेणी को दर्शाते हैं। गद्दीयों द्वारा बनाए गए लोकप्रिय अचार, जैम और मक्खन भी यहां बेचे जाते रहे हैं। शुरुआती दिनों में बारूद, शराब और पेट्रोल का भी स्टॉक उपलब्ध होता था। 1922 में कांगड़ा जिले का यह पहला परिवार था जिनके पास एक कार थी और इसे धर्मशाला से पठानकोट तक एक नियमित टैक्सी के रूप में चला कर सेना की डाक सेवा चलाने के लिए इस्तेमाल किया। नादिर शॉ अबूजी ने ब्रिटिश के साथ किए सहयोग के लिए उन्हें केसर-ए-हिंद की उपाधि से सम्मानित किया।

इसी दुकान के साथ बुक शॉप चलाने वाले प्रेम सागर जो टूर एंड ट्रैवल का भी कारोबार करते हैं का कहना है कि यह स्टोर कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह है। धर्मशाला और मैक्लोडगंज शहर और मेरे लिए यह दुखद क्षण है। स्थानीय लोग नौरोजी एंड संस स्टोर के साथ भावनात्मक रूप जुड़े थे। लेकिन बदलाव प्रकृति का नियम है और इस तरह से इतिहास का निर्माण होता है। कुल प्रकाश शर्मा ने कहा कि हम इस स्टोर को मिस करेंगे जो मैक्लोडगंज का पर्याय है। मेरे पास इस दुकान से लेबल और स्टिकर का संग्रह है। वे अब स्मृति चिन्ह बन जाएंगे।