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हिमाचल की सियासत में कुछ नया पक रहा:चंडीगढ़ में RSS की बैठक और जयराम ठाकुर का दिल्ली जाना बना चर्चा का विषय, प्रदेशाध्यक्ष का मामला या कोई और गंभीर मसला

शिमला12 दिन पहले
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हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, जो हाल ही में दिल्ली जाकर आए हैं। - Dainik Bhaskar
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, जो हाल ही में दिल्ली जाकर आए हैं।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जब-जब दिल्ली जाते हैं, सियासी तौर पर कई तरह के आकलनों का दौर भी शुरू हो जाता है, लेकिन इस बार हिमाचल में भाजपाइयों की जिस तरीके से पिछले कुछ समय से चिंताओं ने घेर रखा है। उसकी वजह कोई एक नहीं है। इसलिए तो दो दिन पहले चंडीगढ़ में हुई आरएसएस की बैठक में भी राज्य सरकार की कारगुजारी, मंत्रियों का हिसाब-किताब, उप-चुनाव की दशा-दिशा और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की चर्चा हुई। इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि दिल्ली में हिमाचल भाजपा को लेकर कुछ न कुछ जरूर पक रहा है।

संगठन में किसी तरह के फेरबदल को लेकर चर्चा हो रही है या फिर कोई और मसला है। लेकिन सूबे में भाजपा की दशा-दिशा किस जगह पर सवार है? उसका आकलन अपने स्तर पर करने वाले अब खुलकर करने लगे हैं। जयराम ठाकुर सरकार कसौटी पर कितना खरा उतर सकती है? इसको लेकर अब सभी अपने-अपने स्तर पर मंथन कर रहे हैं। वक्त ज्यादा नहीं बचा है। कोविड-19 के दौरान लोगों ने सरकार और संगठन की परख बखूबी कर ली है। सत्ता से बाहर बैठे लोग भी अपनी ही पार्टी में जिस तरीके से माहौल बना रहे हैं। उसकी अलग से चर्चा है।

लेकिन पार्टी का एक खेमा ऐसा भी है, जो अपने स्तर पर कुछ खास पकाने का दम रखता है। यही कारण है कि हिमाचल में आने वाले दिनों में कुछ नया पक जाए, तो ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मामला चाहे संगठन में फेरबदल का हो या फिर किसी और तरह का। लेकिन हिमाचल से ताल्लुक रखने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के पास अपने घर की दशा-दिशा को बेहतर बनाने के लिए अभी वक्त है, इसीलिए तन-बुन शुरू हो चुकी है।

कांगड़ा को नहीं कर सकते नजरअंदाज

भाजपा की नैया किस स्तर पर और कौन पार लगा सकता है, इसे लेकर मौजूदा दौर कई तरह के किंतु-परंतु की जकड़न में है। तभी तो प्रदेश अध्यक्ष सुरेश कश्यप और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कसावट को महसूस कर रहे हैं। सुरेश कश्यप की अगुवाई में नगर निगम के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन कितना बेहतर रहा है, सभी जानते हैं। इसलिए कांगड़ा जिले को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और जातीय समीकरणों के आधार पर भी पार्टी के संगठन की जिम्मेदारी कांगड़ा के किसी व्यक्ति पर यदि आती है, तो इसमें नई चुनौती के जरिए सांमजस्य बैठाया जा सकता है। विधानसभा और लोकसभा का उपचुनाव जीता जा सकता है।