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बंजर जमीन पर ऑर्गेनिक हल्दी फार्मिंग से बदली तस्वीर:67 साल के जवान ने हिमाचली किसानों के साथ रोजी-रोटी कमाने का मॉडल पेश किया

विनोद भावुक/कांगड़ा6 महीने पहले
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हिमाचल प्रदेश के 1000 से ज्यादा किसानों ने बंजर और सिंचाई के अभाव वाली जमीन पर ऑर्गेनिक फार्मिंग से कामयाबी की एक नई मिसाल पेश की है। खासकर चंगर क्षेत्र की जिस जमीन पर लावारिस और जंगली जानवरों का आतंक था, वहां अब ऑर्गेनिक हल्दी खेतों में लहलहा रही है। इसके साथ ही इन मेहनतकश किसानों ने सतत आजीविका और स्थायी रोजगार के लिए लाजवाब मॉडल पेश किया है। इस मॉडल की रूपरेखा भारतीय सेना से सेवानिवृत्त 67 साल के जवान ने तैयार की।

कांगड़ा जिला के नगरोटा बगवां विधानसभा हलके के बालूग्लोआ क्षेत्र के मसेरन गांव के रिटायर्ड कर्नल पीसी राणा ने 10वीं के बाद भारतीय सेना ने बतौर सिपाही जॉइन की थी। सेना में रहते हुए पीसी राणा कमीशन पास कर आर्मी अफसर बने। कर्नल पद से सेवानिवृत्त होकर गांव लौटे तो नए मिशन में जुट गए। उन्होंने अपने गहन अध्ययन और शोध के बाद चंगर क्षेत्र में हल्दी की ऑर्गेनिक खेती करने की तैयारी की।

इस काम में कामयाबी मिली तो उन्होंने इसमें अन्य किसानों को भी साथ जोड़ लिया। कर्नल राणा ने हल्दी उत्पादन में देशभर में सात साल की मेहनत से एक मिसाल पेश की। उनके प्रयासों के कारण ही उन्हें टर्मरिक मैन ऑफ इंडिया कहा जाता है। राणा हजारों सीमांत किसानों के जीवन में सामाजिक-आर्थिक बदलाव के भी गवाह बने हैं।

फौज के अनुभव ने दिया नया आइडिया

नगरोटा बगवां विधानसभा का बालुग्लोआ क्षेत्र चंगर क्षेत्र है। यहां सिंचाई के लिए पानी का अभाव है और आज भी अधिकतर जमीन बंजर है। फौज से रिटायर होने के बाद पीसी राणा गांव में पहुंचे तो अनुभव किया कि अधिकतर युवा 5-7 हजार की नौकरी कर रहे हैं लेकिन खेत में काम नहीं करना चाहते। इसका बड़ा कारण था कि यहां खेती बारिश पर निर्भर है। अधिकतर खेतों में जंगली जानवरों और लावारिस पशुओं का आतंक था। पीसी राणा ने अपने सेना के अनुभव से बंजर भूमि पर ऐसी खेती करने की तैयारी की कि लावारिस और जंगली जानवर भी जिसे नुकसान न कर सकें।

सिपाही से आर्मी अफसर, फिर बने प्रोग्रेसिव फार्मर

राणा ने काफी विचारने और अध्ययन के बाद पाया कि हल्दी ही ऐसी फसल है जो बंजर जमीन पर उगाई जा सकती है और जिसे जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते। हल्दी का प्रयोग जहां देश के हर घर में खाना बनाने के लिए होता है, वहीं सौंदर्य प्रसाधनों और कई दवाइयों में भी इसे इस्तेमाल किया जाता है। कर्नल राणा ने बाजार की स्टडी की। सामने आया कि उन्नत किस्म की हल्दी के लिए बाजार में भारी मांग है और अच्छी कीमत किसानों को मिल सकती है।

आंध्र प्रदेश में तैयार किया खास बीज

कर्नल राणा ने हल्दी का उन्नत किस्म का बीज जुटाने के लिए अपने स्तर पर प्रयास शुरू किए। उनकी तलाश आंध्र प्रदेश में जाकर पूरी हुई। उन्होंने प्रगतिशील किसान चंद्रशेखर से मुलाकात कर हल्दी उत्पादन की पूरी जानकारी हासिल की। परंपरागत तौर पर उगने वाली हल्दी तीन साल की फसल है।

अब कर्नल राणा के प्रयासों से देश में हल्दी की ऐसी वैरायटी उपलब्ध है, जो न केवल आठ माह में उत्पादित होती है, बल्कि प्रोडक्शन और क्वालिटी में पहले से कई गुणा बेहतर है। कर्नल राणा ने ‘प्रगति’ नाम की किस्म IIT मुंबई के ‘एक्सपर्ट्स’ को हायर कर साऊथ में ‘डेपलप’ करवाई।

‘टर्नओवर’ करोड़ों में, वैल्यू एडिशन पर फोकस

कर्नल राणा की कमांड में हिमाचल प्रदेश अब हल्दी उत्पादन में नई इबारत लिख रहा है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में 1000 से ज्यादा किसान हल्दी की कॉमर्शियल खेती कर रहे हैं। हल्दी कारोबार का ‘टर्नओवर’ करोड़ों में पहुंच चुका है। किसान हल्दी में वैल्यू एडिशन कर उसका पाउडर और तेल भी पैदा करने लगे हैं। हालांकि अभी ‘फार्मर’ की ‘मार्केट’ तक पहुंच थोड़ी मुश्किल है, मिनिमम स्पोर्ट प्राइस या गवर्नमेंट परचेज जैसे सरकारी कथन दूर की कौड़ी हैं।

कोविड काल में इम्युनिटी बूस्टर के तौर पर हल्दी की उपयोगिता इसकी खेती को प्रोत्साहित करने की जरूरत महसूस हो रही है। कर्नल राणा के अनुसार यदि प्रदेश सरकार इसमें कोई कंट्रीब्यूशन दे तो किसानों के लिए बेहतर विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।

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