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कुल्लू दशहरा में देव मिलन:राजा के सामने नतमस्त्क हुए देवी-देवता, भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह पारंपरिक वेशभूषा में बैठे राजगद्दी पर

कुल्लू3 महीने पहले
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कुल्लू दशहरा में देव मिलन को इकट्‌ठा हुए देवता। - Dainik Bhaskar
कुल्लू दशहरा में देव मिलन को इकट्‌ठा हुए देवता।

ऐतिहासिक कुल्लू दशहरा में देव मिलन हुआ। कुल्लू की रूपी रियासत के राजा जगत सिंह के वंशज एवं भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह पारंपारिक राजाओं की वेषभूषा में सज धज कर ढालपुर में लगी चानणी में राजगद्दी पर बैठे और प्रदेशभर से आए देवी-देवता बारी-बारी उनके सामने नतमस्तक हो गए। इस दृश्य ने दर्शकों को पूरी तरह से भाव विभोर किया। यह मनोरम नजारा दशहरा उत्सव के छठे दिन देखने को मिला। लिहाजा 1660 ईसवीं में शुरू हुई दशहरा उत्सव की परंपरा का आज निर्वाहन किया गया।

दशहरा उत्सव का आगाज तत्कालीन राजा जगत सिंह द्वारा किया गया था। राजा ने उस दौरान अपनी गद्दी को नरसिंह भगवान को सौंप दिया था और स्वयं भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार बन गए थे। उस वाकये को याद रखने और उस दौरान की परंपरा जिंदा रहे। इसके लिए ही पुरानी परंपराओं को दोहराया जाता है। लिहाजा जब राजा गद्दी पर बैठा होता है तो देवता भी अपने हारियानों के साथ ढोल नगाड़ों की थाप पर नाचते हुए राजा की गद्दी के सामने खड़े होकर नमन करते हैं। लिहाजा आज भी इस दृश्य को दोहराया गया।

भगवान रघुनाथ के अस्थाई शिविर में देव मिलन होता हुआ।
भगवान रघुनाथ के अस्थाई शिविर में देव मिलन होता हुआ।

देवी देवताओं का हुआ महामिलन

विश्व के सबसे बड़े देव महाकुंभ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा पर्व में बुधवार को सभी देवी-देवताओं ने भगवान रघुनाथ जी के अस्थायी कैंप में जाकर हाजिरी भरी। सभी देवी-देवताओं का रघुनाथ जी के रजिस्टर में बाकायदा एंट्री होने के बाद देव महामिलन हुआ। इस देव महामिलन को मुहल्ला कहते हैं। इसके पश्चात देवी-देवताओं के दशहरा पर्व में रघुनाथ के दरबार में विधिवत रूप से शक्ति का आह्वान किया गया। देवी हडिंबा माता को फूलों का गुच्छा दिया गया, जिसे शेष कहा जाता है। उसके मिलते ही मुहल्ला पर्व शुरू हुआ। मुहल्ला पर्व में ही देवी-देवता रघुनाथ जी के रथ पर हाजिरी भरते हैं और रघुनाथ के पुजारी रथ पर बैठकर बाकायदा देवताओं के नाम रजिस्टर में दर्ज करते हैं। लेकिन सबसे पहले हडिंबा देवी का नाम दर्ज करने की परंपरा है।

देव मिलन के दौरान उमड़ी भीड़।
देव मिलन के दौरान उमड़ी भीड़।

जब राजा ने सौंपी थी गद्दी

देव समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि जब कुल्लू के राजा को ब्रह्महत्या का दोष लगा था तो वे अयोध्या से श्रीराम चंद्र की मूर्ति कुल्लू लाए थे और दोष के कारण राजा को हुई बीमारी खत्म हो गई थी। तब राजा ने प्रदेशभर के देवी-देवताओं को बुलाया था और स्वयं राजा की गद्दी को नरसिंह भगवान को सौंप दिया था। स्वयं भगवान श्रीराम चंद्र जी के छड़ीबरदार बन गए थे। उसी दौरान दशहरा उत्सव का आगाज किया था।