लाहौली जुराब-दस्तानों को GI टैग:दुनियाभर के बुनकरों में कबायली जिले के बुनकरों का नाम, अब मार्केटिंग में मिलेगा फायदा

कुल्लू2 महीने पहले
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अपनी खूबसूरती की वजह से दुनियाभर के सैलानियों की पसंद बन चुका हिमाचल का कबायली जिला लाहौल-स्पीति अब एक और वजह से सुर्खियों में है। यहां बनने वाले जुराब-दस्तानों को अपनी खास पहचान यानि GI टैग मिल गया है। सेव लाहौल स्पीति सोसायटी को हिमाचल प्रदेश के पेटेंट सूचना केंद्र (एचपी काउंसिल फॉर साइंस टेक्नोलॉजी फॉर एनवायरमेंट) ने यह टैग जारी किया है। इसके लिए बाकायदा लाहौली जुराब और दस्ताने को सोसायटी ने रजिस्टर्ड कराया है। GI टैग मिलने के बाद अब लाहौली जुराब और दस्तानों की देखरेख यही सोसायटी करेगी। अब इनकी मार्केटिंग में भी फायदा मिलेगा।

सेव लाहौल स्पीति सोसायटी के अध्यक्ष प्रेमचंद कटोच ने बताया कि लाहौल घाटी के पारंपरिक हस्तशिल्प को सुरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए यह बेहतरीन शुरुआत है। लाहौल में रहने वाले बुनकरों के हाथ से बुने हुए जुराब-दस्ताने अहम स्थान रखते हैं और इन्हें पूरी दुनिया में बहुत तरजीह मिलती है। यहां के बुनकरों का इतिहास भी काफी अहम है। सोसायटी ने घाटी के इस उत्पाद को संरक्षित करने के मकसद से यह GI टैग लिया है।

लाहौल घाटी में बुनाई जुराब और दस्तानों की बुनाई करती महिलाएं।
लाहौल घाटी में बुनाई जुराब और दस्तानों की बुनाई करती महिलाएं।

सेव लाहौल स्पीति सोसायटी के अध्यक्ष प्रेमचंद कटोच ने बताया कि 1856 में मोरेबियन मिशनरी के केलांग आगमन के साथ-साथ लाहौल में बुनाई पर लिखित जानकारी सामने आने लगी। मिशनरियों की पत्नियों में खासकर मारिया हाईडे ने केलांग में पहला बुनाई स्कूल खोला। इस स्कूल ने स्थानीय महिलाओं के बुनाई कौशल को विकसित करने में अहम योगदान दिया। उसके बाद घाटी में बुनाई उत्पाद के आधुनिकीकरण और व्यवसायीकरण की शुरुआत हुई। घाटी में बुनाई का काम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है।

बहुत आकर्षक है जुराबें
लाहौली जुराब बहुत ही आकर्षक है। इस जुराब के पांच अलग-अलग हिस्से होते हैं जिन्हें बुनाई के बाद जोड़ा जाता है। ऊपरी हिस्से को 8 रंगों के आकर्षक पारंपरिक पैटर्न देकर बुना जाता है। स्थानीय बोली में इस पेट्रन को ‘दशी’ कहा जाता है जिसमें 7 से 8 तरह के पेट्रन शामिल हैं। जुराबों का पहले ऊपर हिस्सा बुना जाता है और सबसे अंत में तलवे का हिस्सा बुना जाता है। उसके बाद दोनों को आपस में जोड़ते हुए पंजे के सिरे तक ले जाते हैं।

सोसायटी अध्यक्ष ने कहा कि लाहौल की वस्तुओं को GI टैग मिलना निश्चित तौर पर यहां के दस्तकारों, स्वयं सहायता समूह, गैरसरकारी संगठनों, स्थानीय उद्यमियों और छोटे पैमाने पर कारोबार करने वाले दुकानदारों के लिए फायदेमंद साबित होने वाला है।

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