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पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन:11 प्रस्ताव पास, सदन में लोकहित विषयों के दौरान नहीं किया जाएगा शोर-शराबा; वन नेशन वन लेजिस्लेटिव प्लेटफार्म बनेगा

शिमला2 महीने पहले
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लोकसभा अध्यक्ष और पीठासीन अधिकारियों के अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सभी संकल्पों को सम्मेलन में रखा और उसे ध्वनिमत से पारित किया गया।  - Dainik Bhaskar
लोकसभा अध्यक्ष और पीठासीन अधिकारियों के अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सभी संकल्पों को सम्मेलन में रखा और उसे ध्वनिमत से पारित किया गया। 

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में हुए पीठासीन अधिकारियों के 82वें सम्मेलन में 11 प्रस्ताव पास किए गए। इसमें राष्ट्रपति, राज्यपाल के अभिभाषण और प्रश्नकाल में लोकहित विषयों के दौरान कोई व्यवधान उत्पन्न न करने का संकल्प पास किया गया। इसके अलावा संसद और विधानमंडलों की बैठकों को एक प्लेटफार्म पर लाने के लिए वन नेशन वन लेजिस्लेटिव प्लेटफार्म को स्थापित करने का संकल्प भी लिया गया। इस बैठक में वर्ष में दो बार पीठासीन अधिकारियों की मीटिंग करने को भी हरी झंडी दी गई।

लोकसभा अध्यक्ष और पीठासीन अधिकारियों के अध्यक्ष ओम बिड़ला ने सभी संकल्पों को सम्मेलन में रखा और उसे ध्वनिमत से पारित किया गया। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन के समापन अवसर पर ओम बिड़ला ने कहा कि पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनेक संकल्प और निर्णय लिए गए हैं। ये निर्णय विधानसभाओं की कार्यप्रणाली में व्यापक परिवर्तन लाने में सहायक होंगे और लोकतंत्र की नई यात्रा करेंगे।

सूचना प्रौद्योगिकी का भरपूर उपयोग करके ‘वन नेशन वन लेजिस्लेटिव प्लेटफॉर्म’ के संकल्प को पूरा करने का प्रयास किया जाएगा और वर्ष 2022 तक लक्ष्य बनाकर इसे मूर्त रूप दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि विधानसभा में सार्थक चर्चा और जनता के प्रति जवाबदेह बनाना ही इस सम्मेलन का संकल्प होगा।

अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में पास हुए ये प्रस्ताव

  • राष्ट्रपति और राज्यपाल के अभिभाषण एवं प्रश्नकाल के दौरान सदन में कोई व्यवधान नहीं होना चाहिए। इसके लिए सभी दलों से फिर चर्चा की जाएगी।
  • शून्यकाल में उठाए जाने वाले लोकहित विषयों के दौरान भी कोई व्यवधान उत्पन्न न किया जाए। इनका जवाब भी समयबद्ध तरीके से विभागों द्वारा दिया जाना चाहिए।
  • विधायिकाओं की निगरानी, विधायन एवं वित्तीय नियंत्रण की जिम्मेदारी में समितियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बदले परिवेश में हमें समितियों की कार्यप्रणाली पर पुनर्विचार की आवश्यकता है ताकि उन्हें और प्रभावी बनाया जा सके।
  • विधान मंडलों की नियमावलियों में एकरूपता {विधायिकाओं की वित्तीय स्वायत्तता
  • 21वी शताब्दी में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ा है। अतः यह सम्मेलन संकल्प करती है कि संसद से लेकर विधानसभा तक सभी को एक प्लेटफार्म पर लाएंगे, जहां लोग सारे विधानमंडलों की कार्यवाही को एक प्लेटफार्म पर देख सके।
  • सम्मेलन संकल्प लेता है कि भारत के विधानमंडल अपने कार्य संचालन में अनुशासन और शालीनता सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रक्रियाओं में वांछित संशोधन करें। सभी सम्बद्ध पक्षों को सम्मिलित कर स्थायी हल सुनिश्चित करें ताकि अगले 25 साल में हमारे विधान मंडल आदर्श हों।
  • किसी भी विधानसभा के पुनर्गठन के बाद नवनिर्वाचित विधायकों के क्षमता संवर्धन एवं प्रशिक्षण के लिए प्रबोधन कार्यक्रम अनिवार्य रूप से आयोजित किए जाए। इस उद्देश्य से उस विधायिका का सचिवालय, लोकसभा सचिवालय से समन्वय कर प्रबोधन कार्यक्रम की रूप रेखा तैयार करे।
  • सर्वश्रेष्ठ विधायिका पुरस्कार का विषय काफी समय से लंबित है। सम्मेलन का मंतव्य है कि इस पर त्वरित निर्णय लेने के उद्देश्य से पीठासीन अधिकारियों की एक समिति का गठन किया जाए जो इस पुरस्कार के मानक तय करें।
  • विधानसभा के प्रति घटती विश्वास को बढ़ाने के लिए नैतिक मूल्य के प्रति विश्वास बढ़ाने की पहल शुरू हो। इसे सामाजिक अभिशाप से मुक्त (नशा मुक्त, अपराध मुक्त, बाल विवाह मुक्त, बाल श्रम मुक्त तथा दहेज मुक्त) बनाने पर विचार हो।
  • भारत के विधानमंडलों को भी विधायी प्रक्रियाओं, नियमावलियों एवं गतिविधियों में शीघ्र समय के अनुरूप परिवर्तन करने की आवश्यकता है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी सदैव की तरह संसद को ही नेतृत्व प्रदान करने की जरूरत है।
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