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सेब पर महंगाई की मार:कीटनाशक के बाद अब खाद महंगी, मजदूरों का भी होगा संकट

शिमलाएक महीने पहले
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  • खाद के दाम बढ़ाने का किसान सभा ने किया विरोध, चिंता में पड़े बागबान
  • पांच हजार कराेड़ का काराेबार होगा प्रभावित, महंगा मिलेगा सेब

सेब सीजन की तैयारियां ताे बागबानाें ने शुरू कर दी है, लेकिन इस बार महंगाई की मार फिर से पड़ेगी। कीटनाशक ताे पहले ही महंगें हाे गए हैं, लेकिन अब खाद के महंगें हाेने के भी आसार बने हुए हैं। आम ताैर पर पाैधे में डाले जाने वाली 12-32-16 खाद और कैन में करीब 700 रुपए की बढ़ाेतरी की जा रही है। जिससे बागबानाें और किसानाें काे खासा नुकसान झेलना पड़ेगा।

वहीं, इस सीजन में फिर से नेपाली मजदूराें का संकट गहरा सकता है। काेराेना के चलते हर राेज लग रही नई बंदिशाें से बागबानाें काे पिछली बार की तरह ही मजदूराें की कमी से जूझना पड़ेगा। जिससे लगभग पांच हजार कराेड़ के सेब काराेबार पर संकट के बादल छा गए हैं।

हिमाचल किसान सभा ने आराेप लगाया है कि भाजपा सरकार द्वारा अब खाद के दामों में भारी वृद्धि से किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। किसान सभा के राज्य अध्यक्ष, महासचिव तथा वित्तसचिव द्वारा जारी संयुक्त बयान में कहा कि खेती और किसानों को बर्बाद करने वाली मोदी के नेतृत्व में केंद्र की सरकार ने सारे रिकाॅर्ड तोड़ दिए हैं। किसानों की आय को दोगुना करने के नाम पर जिस प्रकार का छलावा इस सरकार ने देश के किसानों और आम जनता के साथ किया है, इसकी कोई मिसाल नहीं है।

1200 रुपए से 1900 रुपए हुई खाद की कीमत

50 किलो वाले डीएपी खाद की कीमत में 58.33 फीसदी की बढ़ोतरी का प्रस्ताव है। पिछले महीने तक जो खाद की बोरी 1200 रुपए में मिलती थी, उसकी कीमत अब 1900 रुपए कर दी गई है। इफको ने डीएपी की कीमतों में 700 रुपए प्रति बोरी (50 किलो) की बढ़ोतरी की है।

इसके अलावा एनपीके की कीमतों में भी बढ़ोतरी की गई है। 10-26-26 खाद की कीमत 1175 रुपए से बढ़ाकर 1775 रुपए, 12-32-16 खाद की कीमत 1185 रुपए से बढ़ाकर 1800 रुपए की है, 20-20-0-13 खाद की कीमत 925 रुपए से बढ़ाकर 1350 रुपए की गई है।

सीजन पूरी तरह से नेपाली लेबर पर निर्भर

पांच हजार कराेड़ का सेब काराेबार पूरी तरह से नेपाली मूल के लाेगाें पर ही निर्भर है। सेब का बगीचा तैयार करने से लेकर सेब काे मार्केट तक पहुंचाने का काम अधिकांश बागबान नेपाली मजदूराें से करवाते है। सेब का तुड़ान, उसकी पैकिंग, ग्रेडिंग, ढुलाई सब लेबर पर ही डिपेंड है।

काेराेना संक्रमण के कारण अब लेबर का न मिलना बागबानाें के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। यही नहीं कई बागबानाें ने अपने बगीचाें काे नेपाली लाेगाें के हवाले कर रखा था और खुद शहराें में नाैकरी करते थे। लाॅकडाउन के कारण नेपाली मजदूर वापस अपने देश चले गए और अब वापस नहीं आ पा रहे हैं।

बकाया भी नहीं दे रहे आढ़ती

बागबानाें के पास जहां लेबर और महंगी खाद, कीटनाशक की समस्या पनप गई है, वहीं पिछले सेब सीजन में आढ़तियाें काे बेचे गए सेब की पेमेंट अभी तक नहीं मिली है। आढ़ती बकाया राशि का भुगतान नहीं कर रहे हैं। किसान सभा राज्य वित्त सचिव सत्यवान पुंडीर का कहना है कि बिना योजना के सरकार द्वारा थोपे गए लाॅकडाउन और कोविड महामारी ने पहले ही कृषि लागत मूल्य को बेतहाशा बढ़ा दिया है, ऊपर से खादों की कीमतों में वृद्धि से कंगाली में आटा गीला होने वाली बात हो जाएगी।

सब्सिडी भी सरकार कर चुकी है बंद

चौहान... किसान संघर्ष समिति के सचिव संजय चाैहान का कहना है कि कृषि क्षेत्र में खाद, बीज, कीटनाशक, फफूंदीनाशक, पैकिंग मैटेरियल व अन्य लागत वस्तुओं की कीमतों में निरंतर वृद्धि की जा रही है और सरकार जो कृषि व बागबानी विभाग से किसानों को सहायता व सब्सिडी प्रदान करती थी, उसे समाप्त कर दिया गया है।

अब किसानों व बागबानों को बाजार के भरोसे महंगी लागत वस्तुएं खरीदने के लिए छोड़ दिया गया है। सरकार किसानों व बागबानों को मिलने वाली सब्सिडी तो बंद कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर अपने चहेते कॉर्पोरेट घरानों को लाखों करोड़ों रुपए की छूट देती है।

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