खाली 'जेब' से कैसे पूरे होंगे वादे:कर्ज लेकर हिमाचल सरकार पी रही घी; फिर भी 'मुफ्त सेवाओं' से परहेज नहीं; सत्ता हथियाने की होड़

देवेंद्र हेटा/शिमला3 महीने पहले
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हिमाचल का 'खजाना' खाली है और कांग्रेस व भाजपा ने चुनावी वादों की झड़ी लगा दी है, लेकिन यह नहीं सोचा की पैसे के बिना वादे पूरे करेंगे होंगे? दोनों दलों ने करोड़ों रुपए की मुफ्त सेवाएं (फ्रिबीज) देने का ऐलान ताे कर दिया, लेकिन यह किसी ने नहीं बताया कि इनके लिए बजट कहां से जुटाएंगे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों बड़े दलों में किसी भी तरह प्रदेश की सत्ता हथियाने की होड़ लगी है, लेकिन सत्ता की साइकिल चलाने के लिए पहिए दोनों के पास नहीं हैं।

हिमाचल की सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में बड़ी घोषणाएं OPS, महिलाओं को 1500 रुपए भत्ता, 5 लाख नौकरियां, 300 यूनिट मुफ्त बिजली, स्टार्ट-अप फंड, किसानों व पशुपालकों से कई वादे किए हैं। वहीं BJP के दृष्टिपत्र में मेधावी बच्चियों को साइकिल व स्कूटी, किसानों को 3000 रुपए, 12वीं के टॉपर 5000 बच्चों को 2500 रुपए प्रति माह छात्रवृति, महिलाओं को 3 सिलेंडर, 8 लाख नौकरियां, 900 करोड़ का स्टार्ट-अप फंड इत्यादि वादे शामिल हैं।

कर्मचारियों के 8000 करोड़ देय

अब सवाल उठ रहे हैं कि वादों के लिए बजट कहां से आएगा? हिमाचल में कर्मचारियों का लगभग 8000 करोड़ रुपए का जनवरी 2016 से नए वेतनमान का एरियर बकाया है। इसे न तो पूर्व कांग्रेस सरकार और न ही मौजूदा जयराम सरकार 5 सालों में दे पाई है। एक किश्त जरूर दी गई है, वह भी 30 से 50 हजार की ही मिल पाई है, जबकि कई कर्मचारियों का 5 से 7 लाख तक का एरियर बकाया हैं। पेंशनर्स को तो पहली किश्त ही नहीं मिली है।

इनकी देनदारियां भी सालों से पेंडिंग

जिन बागवानों ने बैंक से कर्ज लेकर एंटी हेल नेट, सिंचाई टैंक, ग्रेडिंग पैकिंग हाउस, ग्रेडिंग पैकिंग मशीनें, सोलर फेंसिंग लगा रखी हैं, उनकी सब्सिडी कई क्षेत्रों में तो 4 से 5 साल बाद भी नहीं दी जा रही हैं।

पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने को भी लेना पड़ रहा नया ऋण

छोटे से पहाड़ी राज्य, हिमाचल पर पहले ही 65,800 करोड़ का कर्ज चढ़ा हुआ है। परसों तक 2000 करोड़ का नया कर्ज भी प्रदेश के खाते में आ रहा है। आलम यह है कि पुराने कर्ज का ब्याज लौटाने के लिए भी नया कर्ज लेना पड़ रहा है। इसके लिए दोनों दलों की सरकारें समान रूप से जिम्मेदार हैं।

कर्ज लेने की सीमा न बढ़ाई होती तो आज मुश्किलें बढ़ती

2019 में एक बार ऐसा ऐसा वक्त आ गया था, जब प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा पूरी हो चुकी थी। तब केंद्र सरकार ने कोरोना का हवाला देते हुए GDP की तुलना में कर्ज लेने की सीमा 3 फीसदी बढ़ाकर 5 फीसदी की। इससे ही अभी विकास का पहिया चल रहा है, मगर चुनाव जीतने के लिए जिस तरह की घोषणाएं की जा रही हैं, उन पर करोड़ों की लागत प्रदेश को ओर कंगाली की ओर धकेल रही है।