हिमाचल उपचुनाव 2021 पर भास्कर रिपोर्ट:4 सीटों पर प्रत्याशियों और पार्टियों की स्थिति का आकलन, जानिए किस तरह मुश्किलों भरी हैं भाजपा-कांग्रेस की राहें...

शिमला2 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

हिमाचल उपचुनाव 2021 के लिए दोनों राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक कर दिए हैं। उम्मीदवार चुनाव प्रचार में भी जुट गए हैं। प्रत्याशी चुनाव प्रचार में एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे, ताकि अपनी जीत पक्की कर सकें। मंडी से मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर समेत हिमाचल सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर, डॉ. रामलाल मार्कंडेय और ठाकुर महेंद्र सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। ऐसे में मंडी संसदीय क्षेत्र हॉट सीट बनी हुई है। अन्य तीन विधानसभा क्षेत्रों में भी भाजपा और कांग्रेस के लिए अपने प्रत्याशियों को जीताना कोई आसान काम नहीं होगा। दोनों पार्टियों को एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा, तभी उपचुनाव में सीट निकाल पाएंगे।

ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर, भाजपा के मंडी संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी।
ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर, भाजपा के मंडी संसदीय क्षेत्र से प्रत्याशी।

मंडी में राजपरिवार और सैनिक के बीच राजनीतिक लड़ाई

मंडी संसदीय सीट पर अगर सियासी समीकरणों पर नजर डाली जाए तो यहां पर राजनीतिक लड़ाई राज परिवार और एक पूर्व सैनिक के बीच में है। भाजपा प्रत्याशी ब्रिगेडियर खुशहाल ठाकुर मंडी जिला के द्रंग विधानसभा क्षेत्र के तहत आने वाले नगवांई गांव के रहने वाले हैं। कारगिल युद्ध में इन्होंने भारत की जीत के लिए रास्ता तैयार किया और टाइगर हिल व तोलोलिंग पर तिरंगा फहराया। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले जब आतंकवादियों ने पुलवामा में आतंकी हमला करके 37 जवानों को मार दिया था। उस समय लोगों में खासा रोष पनपा था। देश में ऐसी लहर चली कि भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में बैठ गई। ऐसे ही अब जब कांग्रेस ने मंडी से इमोशनल कार्ड खेलते हुए प्रतिभा सिंह को टिकट दिया है तो भाजपा ने भी सैनिक कार्ड खेलते हुए पूर्व ब्रिगेडियर को टिकट देकर मुकाबला रोचक बना दिया। ब्रिगेडियर खुशहाल सिंह पहली बार चुनावी मैदान पर हैं, जबकि प्रतिभा सिंह चौथी बार इस सीट से चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में प्रतिभा सिंह के पास अनुभव भी है और दो बार वहां से जीत भी दर्ज कर चुकी हैं। इसलिए मंडी संसदीय क्षेत्र में इस बार मुकाबला रोचक रहने वाला है।

अर्की में भाजपा-कांग्रेस के बागी बने चिंता का विषय

अर्की विधानसभा क्षेत्र स्वर्गीय पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का चुनावी क्षेत्र था, लेकिन उनके देहांत के बाद यह सीट खाली हो गई। अर्की से भाजपा के प्रत्याशी रतन पाल सिंह हैं, जबकि कांग्रेस के प्रत्याशी संजय अवस्थी हैं और यहां पर भाजपा-कांग्रेस दोनों की राह आसान नहीं, क्योंकि संजय अवस्थी को टिकट मिलने के बाद ब्लॉक कांग्रेस के पदाधिकारियों ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने यहां पर कार्यकारिणी को भंग करके नए कार्यकारी अध्यक्ष को बिठा दिया। अब भंग की गई कार्यकारिणी के सदस्य अपनी अलग रणनीति तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बैठक करके यह स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस को सपोर्ट नहीं करेंगे और न ही अपना कोई निर्दलीय उम्मीदवार देंगे। ऐसे में यहां पर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर भाजपा के खेमे में भी कुछ ऐसा ही है। रतन पाल सिंह को टिकट देने के बाद पार्टी के दो बार के पूर्व विधायक गोविंद राम शर्मा पूरी तरह से नाराज हो गए हैं और उन्होंने निर्दलीय ही चुनाव में उतरने का ऐलान कर दिया है। उनके साथ अर्की की सियासत के कई दिग्गज नेता हैं। ऐसे में यहां पर भाजपा प्रत्याशी रतन पाल सिंह की भी राहें आसान नहीं दिख रहीं। वहीं जिस तरह से कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके पदाधिकारियों ने कांग्रेस का साथ न देने की बात कही है, उससे कहीं न कहीं यह कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं यह गोविंद राम शर्मा को ही आजाद उम्मीदवार के रूप में अंदर खाते सपोर्ट तो नहीं कर रहे! अगर ऐसा होता है तो भाजपा और कांग्रेस दोनों प्रत्याशियों के लिए यहां पर जीत सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाएगा। अब देखना यह है कि भाजपा और कांग्रेस अपने रुठे हुए को मनाने आती है या नहीं।

निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं चेतन बरागटा

जुब्बल कोटखाई शिमला जिले का विधानसभा क्षेत्र है। भाजपा के पूर्व विधायक नरेंद्र बरागटा के निधन के बाद यह सीट खाली है। टिकट आवंटन के बाद यहां भी भाजपा में तगड़ी रार पड़ गई है, क्योंकि नरेंद्र बरागटा के बेटे चेतन बरागटा खुद का टिकट फाइनल मानकर चल रहे थे, लेकिन पार्टी ने बिल्कुल लास्ट समय में तीन बार की जिला परिषद सदस्य रह चुकीं नीलम सरैइक को टिकट देकर चौंका दिया। ऐसे में टिकट न देने पर चेतन बरागटा पार्टी से खासे नाराज हैं और उनके समर्थन में लोग भी उनसे यही कह रहे हैं कि अगर भाजपा उन्हें टिकट नहीं देती है तो वह निर्दलीय खड़े हो जाएं। ऐसे में अब वह भी निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं। इसलिए भाजपा की राह आसान नहीं दिख रही। वहीं जुब्बल कोटखाई हमेशा ही कांग्रेस का गढ़ रहा है। कांग्रेस ने यहां से रोहित ठाकुर को चुनावी मैदान में उतारा है। रोहित ठाकुर 2003 में पहली बार जुब्बल कोटखाई से विधानसभा चुनाव जीते, लेकिन 2007 में भाजपा के नरेंद्र बरागटा से चुनाव हार गए। इसके बाद 2012 में रोहित ठाकुर फिर जीते और वह वीरभद्र सरकार में सीपीएस बने। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में नरेंद्र बरागटा से एक बार फिर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उनके दादा स्वर्गीय राम लाल ठाकुर जुब्बल-कोटखाई से 5 बार विधायक रह चुके हैं। इस तरह यह सीट कांग्रेस का मुख्य गढ़ है। भाजपा से कई नेता व कार्यकर्ता नाराज चले हुए हैं तो पार्टी के लिए सीट निकालना काफी चुनौतीपूर्ण होगा।

फतेहपुर में भी भाजपा के टिकट के बाद घमासान

फतेहपुर में भाजपा ने किसान मोर्चा के पदाधिकारी बलदेव ठाकुर को चुनाव मैदान में उतारा है। हाईकमान ने पूर्व सांसद कृपाल परमार का टिकट काटकर बलदेव ठाकुर को टिकट दिया। बलदेव ठाकुर एक बार भाजपा और दूसरी बार बागी होकर निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। ऐसे में यहां पर भी इनको टिकट देना भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को रास नहीं आ रहा। इसलिए भाजपा को अपने प्रत्याशी की जीत के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना होगा। वहीं कांग्रेस ने अपने पूर्व विधायक व पूर्व मंत्री सुजान सिंह पठानिया के पुत्र भवानी सिंह पठानिया को चुनावी मैदान में उतारा है और इमोशनल कार्ड चला है। अब देखना यह है कि यह इमोशनल कार्ड चल पाता है या नहीं। भवानी सिंह पठानिया इससे पहले किसी मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर कार्य कर चुके हैं।

फिलहाल जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं, उससे लगता है कि दोनों ही पार्टियों के लिए अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों और संसदीय क्षेत्र पर सीट निकालना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। अगर भाजपा और कांग्रेस को अपने प्रत्याशियों को जीत दिलवानी है तो उन्हें अपने रुठे हुए नेताओं, कार्यकर्ताओं को मनाना होगा। अन्यथा आने वाले समय में यह दोनों पार्टियों के लिए काफी नुकसानदायक होंगे।

खबरें और भी हैं...