क्या हिमाचल में हंग असेंबली बन सकती है?:एक्सपर्ट बोले- यह भी संभव, 1998 में भी किसी को नहीं मिला था बहुमत

पूनम भारद्वाज, शिमला2 महीने पहले
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पहाड़ों की हवा में जिस तरह से विधानसभा चुनाव मतदान के बाद असमंजस का माहौल बना हुआ है, उसे देखें तो क्या प्रदेश में इस बार भी हंग असेंबली बन रही है। हालांकि भाजपा मिशन रिपीट के और कांग्रेस सत्ता में वापसी को लेकर दावे जरूर कर रही है, लेकिन पार्टी के इंटरनल सोर्स इससे इत्तेफाक रखते नहीं लग रहे। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इस बार सत्ता की चाबी पार्टी के बागियों अथवा आजाद उम्मीदवारों के हाथ में होने के कयास लगा रहे हैं।

1998 में भी दोनों पार्टियों को नहीं मिला था बहुमत
विधानसभा चुनाव के इतिहास पर यदि नजर दौड़ाई जाए तो 1998 के चुनाव में भी भाजपा और कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला था। तब रमेश धवाला भाजपा के लिए किंग मेकर बने। रमेश धवाला पार्टी से टिकट न मिलने के कारण आजाद होकर चुनाव में उतरे और जीत गए। पहले उन्होंने कांग्रेस को समर्थन देकर कांग्रेस की सरकार बनाई और 6 दिन के बाद कांग्रेस से अपना समर्थन वापस लेकर भाजपा को समर्थन दिया।

1998 के चुनाव में दोनों दलों ने जीते थे 31-31 प्रत्याशी
1998 के विधानसभा के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के 31-31 उम्मीदवार चुनाव जीत कर आए थे। पूर्ण बहुमत दोनों ही दलों के पास नहीं था। उस समय पंडित सुखराम की नई गठित हिमाचल विकास कांग्रेस पार्टी भी चुनाव जीत कर आई थी, लेकिन किसी भी दल के पास बहुमत न होने के कारण पंडित सुखराम ने भी भाजपा को अपना समर्थन दिया। भाजपा बहुमत में आ गई और प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी।

क्या कहते हैं राजनीतिक विशेषज्ञ... हिमाचल की राजनीति पर नजर रखने वाले प्रदेश विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर रमेश चौहान कहते हैं कि इस बार चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों पर स्थानीय मुद्दे भारी पड़ते दिखाई दे रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, कर्मचारी, बागवानी जैसे कई विषय ऐसे हैं, जो मुकाबले को कड़ा कर रहे हैं।

प्रोफेसर रमेश चौहान के मुताबिक, कांग्रेस ने भी जो घोषणाएं की हैं, वह कर्ज में डूबे हिमाचल के लिए लागू कर पाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। घोषणाओं को लागू करने में आर्थिक चुनौतियां आएंगी।

बागियों ने बढ़ाई मुश्किलें
1998 की तरह इस बार हंग असेंबली बनने की पूरी संभावना है। इस बार भी विधानसभा चुनाव में सत्ता की चाबी बागियों या निर्दलियों के हाथ में दिखाई दे रही है। इसमें सबसे ज्यादा बागी भाजपा के हैं, जो पार्टी के मिशन रिपीट की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं। पार्टी के करीब 21 बागी चुनाव मैदान में खड़े हैं। कांग्रेस के बागी नेता भी पार्टी का चुनावी समीकरण बिगाड़ रहे हैं, इसलिए दोनों दलों का बागियों पर ज्यादा फोकस है।

इन सीटों पर बागी कर सकते फेरबदल
भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के गृह जिला बिलासपुर की बात करें तो यहां पर सुभाष ठाकुर और सुभाष शर्मा अभी भी नाराज चल रहे हैं। भाजपा ने भरमौर से जियालाल का टिकट बदलकर डॉक्टर जनक राज को दिया है। चंबा से पहले इंदिरा कपूर को और बाद में टिकट बदलकर नीलम नैय्यर को दिया। किन्नौर से तेजवंत नेगी का टिकट काटकर सूरत नेगी को दिया गया। रामपुर में भी टिकट बदलकर कौल सिंह नेगी को दिया गया।